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छत्तीसगढ़़ के युवाओं की सेहत पर मंडरा रहा जंक फूड का खतरा

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रायपुर: इस समय हम दुनिया की सबसे बड़ी युवा आबादी वाले देश के नागरिक हैं, लेकिन इस आबादी की सेहत पर ‘जंक फूड’ का गहरा साया मंडरा रहा है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एचएफएचएस-6) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय किशोरों के खान-पान की आदतों में आया बदलाव एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट का रूप ले चुका है। इस मामले में छत्तीसगढ़ की ताजा रिपोर्ट चिंताजनक तो है ही, साथ ही कुछ बिंदु ध्यान देने योग्य हैं:-

0- एचएफएचएस-6 के आंकड़े बताते हैं घर के भोजन का स्थान पैकेटबंद स्नैक्स ने ले लिया है। डिजिटल विज्ञापनों, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स और सेलिब्रिटी एंडोर्समेंट के चलते किशोरों में प्रोसेस्ड फूड के प्रति आकर्षण खतरनाक स्तर तक बढ़ गया है। शहरी ही नहीं, ग्रामीण इलाकों के किशोर भी सप्ताह में कई बार इंस्टेंट नूडल्स, आलू के चिप्स, नमकीन, पिज्जा, बर्गर और कार्बोनेटेड कोल्ड ड्रिंक्स (सॉफ्ट ड्रिंक्स) का सेवन कर रहे हैं। जंक फूड के बढ़ते चलन के कारण किशोरों की थाली से दाल, हरी पत्तेदार सब्जियां, मोटे अनाज और फल गायब हो रहे हैं। ये खाली कैलोरी (Empty Calories) किशोरों का पेट तो भर रही हैं, लेकिन उनके शरीर को जरूरी पोषक तत्व नहीं दे पा रही है। 0- एचएफएचएस-6 के आंकड़ों के अनुसार सर्वेक्षण के आंकडे़ शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों में बड़ी चुनौती बनकर उभरे हैं। एचएफएचएस-5 से एचएफएचएस-6 की तुलना करें तो पता चलता है की 15 से 49 वर्ष के शहरी और ग्रामीण युवाओं में मोटापे की दर पहले से बढ़ी हुई है। इसी प्रकार महिलाओं के मोटापे की दर 14 से बढ़ाकर 20.3 हुई है। विशेष रूप से अस्वास्थ्यकर खान-पान और शारीरिक रूप से निष्क्रिय जीवनशैली, स्‍क्रीन टाइम बढ़ने का सीधा नतीजा वजन बढ़ने के रूप में सामने आया है। शहरों के संपन्न परिवारों के किशोरों में ओवरवेट (ज्यादा वजन) और मोटापे की दर में पिछले सर्वेक्षणों की तुलना में काफी तेजी से वृद्धि दर्ज की गई है। पहले मोटापा केवल अमीर या शहरी बच्चों की समस्या माना जाता था। लेकिन एचएफएचएस-6 के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते और कम गुणवत्ता वाले पैकेटबंद स्नैक्स की आसान पहुंच होने के कारण ग्रामीण किशोर भी अब तेजी से मोटापे की चपेट में आ रहे हैं।

*0- हिडन हंगर:* मोटे लेकिन एनीमिकजंक फूड कैलोरी से भरपूर होते हैं, लेकिन इसमें विटामिन और मिनरल्स शून्य होते हैं। इस वजह से भारतीय किशोरों में एक अजीब विरोधाभास देखने को मिल रहा है। देश की 50 फीसदी से अधिक किशोरियां एनीमिया (खून की कमी) की शिकार हैं और किशोरों में भी यह दर ऊंची है। इस स्थिति को चिकित्सा विज्ञान में ‘हिडन हंगर’ (छिपी हुई भूख) कहा जाता है, जहां एक किशोर देखने में भारी-भरकम या मोटा लग सकता है, लेकिन आंतरिक रूप से वह गंभीर कुपोषण और आयरन की कमी से जूझ रहा होता है।

0- एचएफएचएस-6 का सबसे चिंताजनक संकेत यह है कि जो बीमारियां पहले 40 साल की उम्र के बाद होती थीं, वे अब 15 से 19 साल के किशोरों में पैर पसार रही हैं। मीठे पेय पदार्थों (सॉफ्ट ड्रिंक्स, पैकेज्ड जूस) के अत्यधिक सेवन के कारण किशोरों में इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ रहा है, जिससे वे कम उम्र में ही डायबिटीज के मुहाने पर खड़े हैं। पैकेटबंद चिप्स, सॉस और नूडल्स में सोडियम (नमक) की मात्रा बहुत अधिक होती है। इसके नियमित सेवन से किशोरों में हाइपर टेंशन के लक्षण देखे जा रहे हैं।

0- जंक फूड और किशोर स्वास्थ्य संकेतक युवाओं में मुख्य रुझान एचएफएचएस-6 स्वास्थ्य पर प्रभाव खान-पान का तरीका एचएफएसएस (हाई फैट, शुगर, साल्ट) और अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड का अत्यधिक सेवन। शरीर में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, कमजोर इम्युनिटी। मोटापा किशोरों और युवाओं में ओवरवेट होने की दर में निरंतर उछाल। *भविष्य में दिल की बीमारियों और स्ट्रोक का खतरा:* ब्लड, शुगर का स्तर 15 साल के किशोरों और युवाओं में खाली पेट ग्लूकोज का स्तर एक बढ़ा हुआ पाया गया।

एचएफएचएस-6 के इन चौंकाने वाले आंकड़ों के बाद नीति निर्माताओं और स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने कड़े कदम उठाने की मांग की है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (एफएसएसएआई) अब पैकेट के आगे ‘रेड वॉर्निंग साइन’ लगाने पर विचार कर रहा है, ताकि यह साफ दिखे कि भोजन में नमक, चीनी या फैट कितना ज्यादा है। इसी तरह स्कूल परिसरों और उनके 50 मीटर के दायरे में अस्वास्थ्यकर भोजन और कोल्ड ड्रिंक्स की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने की नीतियों को सख्ती से लागू करने की जरूरत है। ‘ईट राइट इंडिया’ और ‘पोषण अभियान’ के जरिए अब स्कूलों और कॉलेजों में किशोरों को सीधे टारगेट कर काउंसलिंग की जा रही है, ताकि वे पारंपरिक और सेहतमंद भारतीय भोजन (जैसे बाजरा, रागी, छाछ, फल) की तरफ वापस लौट सकें।

*… तो बीमार हो जाएगी युवा पीढ़ी*

यदि समय रहते किशोरों की इस ‘जंक फूड’ संस्कृति पर लगाम नहीं कसी गई, तो भारत का ‘डेमोग्राफिक यूथ डिविडेंड’ बीमारियों के बोझ तले दब जाएगा। इस कार्य के लिए भी सरकार की ओर इशारा करने से कुछ नहीं होगा। परिवार के सदस्यों, विशेष रूप से माता- पिता को अपने बच्चों के लिए समय निकलना पड़ेगा। अगर घर पर स्वच्छ और पौष्टिक भोजन बनेगा, तो बच्चे भी उसका सेवन करेंगे। परिवार दिन में एक बार साथ में बैठकर खाना खाएं।

 

*डॉ. अभया जोगलेकर*

डायटिशियन व प्राचार्य

बद्री प्रसाद लोधी गवर्नमेंट कॉलेज, आरंग

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