Amazing Biology of the Education Department: When a 15-year-old student became a mother, and became a teacher ‘Dhritarashtra’!
जिला ब्यूरो फिलिप चाको (बालोद ): जिले के शिक्षा विभाग ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि कागज़ों पर ‘सर्व शिक्षा अभियान’ चलाने वाले हमारे गुरुजी, जीवन के बुनियादी विज्ञान में कितने ‘विद्वान’ हैं! खबर बालोद जिले की है, जहाँ महज़ 15 साल 9 महीने की एक नाबालिग छात्रा माँ बन गई। लेकिन कहानी सिर्फ इतनी नहीं है; असली दिलचस्प पहलू तो स्कूल के उन ज्ञानी शिक्षकों का है, जिन्हें महीनों तक छात्रा के शरीर में आ रहे बदलाव का ‘भान’ तक नहीं हुआ।
अरे जनाब! जो छात्रा अपनी डिलीवरी के दिन तक लगातार स्कूल की दहलीज लांघती रही, उसके शरीर के जैविक बदलावों को हमारे ‘परमज्ञानी’ शिक्षक और शिक्षिकाएँ पहचान ही नहीं पाए। अब सवाल यह उठता है कि जो शिक्षक एक गर्भवती छात्रा के शारीरिक बदलावों को नहीं समझ सके, वे क्लासरूम में बच्चों को जीव विज्ञान (Biology) कैसे पढ़ाते होंगे? या फिर सच यह है कि सब कुछ जानते हुए भी ‘धृतराष्ट्र’ बने रहना ही अपनी नौकरी और आराम को सुरक्षित रखने का सबसे आसान फॉर्मूला था?
‘खानापूर्ति’ के महारथी और वातानुकूलित कुर्सियाँ
शिक्षा विभाग आए दिन अपने कारनामों के लिए अखबारों की सुर्खियों में मुफ़्त की टीआरपी बटोरता रहता है। लेकिन इस घटना ने महकमे की संवेदनहीनता पर से पर्दा हटा दिया है। शिक्षक नाम मात्र की हाजिरी लगाकर अपनी जिम्मेदारी की ‘खानापूर्ति’ करते रहे और एक बच्ची अपने भीतर एक नए जीवन को ढोती हुई हर दिन स्कूल आती रही।
*बड़ा सवाल: क्या यह महज़ शिक्षकों की ‘अज्ञानता’ थी, या जिम्मेदारी से बचने का (जानबूझकर किया गया) नाटक ?*
इधर, शिक्षा विभाग के उच्च अधिकारी अपने चमचमाते, वातानुकूलित दफ़्तरों को शयनकक्ष समझकर चैन की बंसी बजा रहे हैं। साहबों को लगता है कि एसी रूम की ठंडक में बैठकर सिर्फ फाइलें आगे सरकाना ही उनका कर्तव्य है।
प्रशासन से गुहार: पर्दे के पीछे छिपे ‘कामचोरों’ पर भी हो प्रहार
छात्रा नाबालिग है, इसलिए उसकी गोपनीयता और निजता का सम्मान करते हुए कई जानकारियों को सार्वजनिक नहीं किया जा रहा है। इसका मतलब यह कतई नहीं कि इस पूरे मामले के दोषियों को अभयदान मिल गया है।
पुलिस और प्रशासन तो असली आरोपी तक पहुँच ही जाएगा, लेकिन सवाल उन ‘कृपादृष्टि प्राप्त’ और ‘विशिष्ट अनुग्रह’ वाले शिक्षकों का क्या, जो स्कूल परिसर में रहकर भी अपनी आँखें मूँदे बैठे रहे?
उच्च अधिकारियों को अब अपनी आरामदेह कुर्सियों से उठकर ऐसे कामचोर और संवेदनहीन शिक्षकों पर कठोरतम कार्रवाई करनी होगी। ऐसा चाबुक चलना ज़रूरी है, ताकि खर्राटे ले रहे शिक्षा विभाग के बाकी शिक्षक-शिक्षिकाएँ भी अपनी नींद से जाग सकें!

