विशेष ग्राउंड रिपोर्ट फिलिप चाको (बालोद): क्या आप बालोद जिले में रहते हैं? अगर हाँ, तो आपको यह जानकर गर्व (या खौफ!) होना चाहिए कि यहाँ हादसों को न्योता देने के लिए अलग से कोई मेहनत नहीं करनी पड़ती। यहाँ की व्यवस्था खुद बारूद के ढेर पर बैठकर बीड़ी सुलगाने जैसी बेफिक्र है!
शहर हो या ग्रामीण इलाका, अवैध और खतरनाक तरीके से संचालित पटाखा गोदामों का जाल बिछ चुका है। कुछ गोदाम तो घनी आबादी के बीचों-बीच सांस ले रहे हैं, तो कुछ सीधे अस्पतालों और स्कूलों की नाक के नीचे गुलजार हैं।
*दिवाली का ‘मास्टरस्ट्रोक’: स्कूल मैदान में पटाखा मंडी और बगल में बच्चों का अस्पताल!*
बालोद की सबसे अद्भुत और आंखें खोल देने वाली व्यवस्था तो दिवाली के समय देखने को मिलती है:
* *स्कूल के मैदान में पटाखा मंडी: जहाँ साल भर बच्चे भविष्य गढ़ते हैं, त्यौहार आते ही वहाँ ‘विस्फोटक बाजार’ सजा दिया जाता है।*
* *बगल में बच्चों का निजी अस्पताल: बारूद के इस विशाल संग्रह के ठीक पास बच्चों का निजी अस्पताल भी संचालित है। यानी भगवान न करे अगर कोई हादसा हो, तो एंबुलेंस को दूर न जाना पड़े!*
** मुख्य मार्ग पर भारी ट्रैफिक: यह मंडी जिस जगह सजती है, वह बाजार आने-जाने का मुख्य मार्ग है। भीड़-भाड़, गाड़ियों की कतारें और बीच में सुलगता हुआ पटाखों का बाजार—सुरक्षा का इससे बेहतरीन “अधोसंरचना मॉडल” और कहाँ मिलेगा?*
सुरक्षा का महा-इंतजाम: ‘पानी चूहता हुआ नगर पालिका का टैंकर’
अब आप सोच रहे होंगे कि इतनी बड़ी मंडी और घनी आबादी के बीच सुरक्षा के क्या इंतजाम हैं? तो जनाब, प्रशासन की दूरदर्शिता की तारीफ करनी होगी!
सुरक्षा के नाम पर मैदान के कोने में नगर पालिका का एक पानी टपकता (चूहता) हुआ टैंकर खड़ा कर दिया जाता है। यानी आग लगने से पहले ही पानी खत्म हो जाए और अगर आग लग भी जाए, तो पानी से ज्यादा उम्मीद भगवान भरोसे ही रहे! क्या यही है हमारी सुरक्षा व्यवस्था?
नियम-कायदे और सजा का कानूनी प्रावधान
कानून की किताबों की मानें तो यह पूरी स्थिति विस्फोटक अधिनियम (Explosives Act, 1884) और नगर निगम/पालिका सुरक्षा नियमों की सरेआम धज्जियां उड़ाना है:
* विस्फोटक अधिनियम की धारा 9बी (Section 9B): बिना सुरक्षा मानकों और बिना उचित लाइसेंस के रिहायशी/सार्वजनिक क्षेत्रों में पटाखा गोदाम या मंडी लगाने पर 3 साल तक की सख्त कैद और भारी जुर्माने का प्रावधान है।
* भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएं (लापरवाही से जान जोखिम में डालना): स्कूल मैदान और अस्पताल जैसी संवेदनशील जगहों पर जान-माल को खतरे में डालने पर जेल की हवा और आपराधिक मामला तय होता है।
* सुप्रीम कोर्ट और अग्निशमन निर्देश: अस्पताल, स्कूल और भीड़-भाड़ वाले रास्तों से पटाखा दुकानों/गोदामों की दूरी तय है, जिसका पालन न करना सीधे तौर पर अदालत की अवमानना और अपराध है।
क्या हम किसी बड़ी अनहोनी का इंतजार कर रहे हैं?
कहते हैं कि “हार ही जीत की ओर प्रोत्साहित करती है”—यह शिक्षा का ज्ञान तो हम सबने प्राप्त किया है, लेकिन क्या अब हम हादसों के मामले में भी “दुर्घटना के बाद ही सीखने” का इंतजार कर रहे हैं?
अगर बालोद के इस मुख्य मार्ग और स्कूल मैदान में कोई अनहोनी हो गई, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होगी?
* क्या उस नगर पालिका की, जिसका टैंकर खुद ही पानी के लिए तरस रहा है?
* या उस प्रशासन की, जो सब कुछ देखते हुए भी मोतियाबिंद का शिकार बना हुआ है?
* या फिर उन लोभी व्यापारियों की, जिन्हें चंद रुपयों की मोटी कमाई के आगे इंसानी जिंदगियां खिलौना नजर आती हैं?
शासन-प्रशासन से कड़ा निवेदन: अब तो डंडा चलाइए!
यह सिर्फ एक व्यंग्य नहीं, बल्कि बालोद की जनता की सुरक्षा से जुड़ा एक गंभीर सवाल है। प्रशासन से विनम्र अपील है कि:
व्यापार की आड़ में अपनी मोटी कमाई के लिए लोगों की जान दांव पर लगाने वाले लोभियों पर इस बार कानून का सख्त डंडा चलाया जाए। सुरक्षा नियमों को ताक पर रखकर स्कूल मैदान, अस्पताल के पास और घनी आबादी के बीच चल रही मंडियों और गोदामों को तत्काल उचित एवं सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित किया जाए, ताकि किसी निर्दोष की बलि न चढ़े!

