चाय पर चर्चा: कवर्धा शहर में इन दिनों चाय की हर टपरी चौक-चौराहे और राजनीतिक गलियारों में एक ही नाम की चर्चा सुनाई दे रही है। चर्चा उस शख्स की, जिसके बारे में कहा जाता है कि जिले की कोई भी विवादित जमीन उससे छिपी नहीं रहती।
कहते हैं कि जैसे ही किसी जमीन पर विवाद शुरू होता है किसी परिवार में बंटवारे का झगड़ा होता है, किसी सरकारी भूमि पर कब्जे की चर्चा होती है या किसी जमीन का मामला पुलिस और न्यायालय तक पहुंचता है, वैसे ही इस व्यक्ति के कान खड़े हो जाते हैं। उसके बाद शुरू होता है जमीन खरीदने का खेल।
चर्चा है कि यह व्यक्ति पहले विवादित जमीन को औने-पौने दाम में खरीदता है फिर रजिस्ट्री करवाता है और उसके बाद उस विवाद को सुलझाने की पूरी मशीनरी सक्रिय हो जाती है। लोग सवाल पूछ रहे हैं कि आखिर वह कौन-सी ताकत है जो ऐसे मामलों को इतनी आसानी से निपटा देती है
शहर में यह भी कहा जा रहा है कि जिस जमीन पर आम आदमी वर्षों तक न्याय के लिए भटकता रहता है उसी जमीन का समाधान इस व्यक्ति के हाथ में आते ही कुछ ही समय में निकल आता है। आखिर ऐसा कैसे होता है क्या यह केवल प्रभाव का खेल है, या फिर कहीं कोई अदृश्य संरक्षण भी काम कर रहा है
चर्चाओं का बाजार गर्म है। कोई इसे राजनीतिक संरक्षण बताता है, कोई प्रशासनिक पहुंच का कमाल कहता है तो कोई इसे धनबल और संपर्कों का जाल बताता है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन शहर में उठ रहे सवाल लगातार बड़े होते जा रहे हैं।
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सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी जमीन का विवाद इतना आसान था कि खरीदने के बाद तुरंत सुलझ गया तो फिर मूल मालिक वर्षों तक परेशान क्यों रहा और यदि विवाद गंभीर था तो उसका समाधान इतनी तेजी से कैसे हो गया
कवर्धा की जनता अब पूछ रही है कि आखिर विवादित जमीनों की हर खबर सबसे पहले इस व्यक्ति तक कैसे पहुंच जाती है कौन लोग हैं जो उसे सूचनाएं देते हैं और किसके संरक्षण में यह पूरा खेल संचालित हो रहा है
चाय की चुस्कियों के बीच आज बस यही चर्चा है कि आखिर यह विवादित जमीनों का खिलाड़ी कौन है, जिसकी पहुंच विवाद शुरू होने से पहले ही वहां तक पहुंच जाती है जहां आम आदमी की सोच भी नहीं पहुंचती।
चाय पर चर्चा है जनाब, इसलिए सवाल भी जनता के हैं और जवाब भी जनता ही तलाश रही है।
पत्रकार दीपक तिवारी

