रायपुर। छत्तीसगढ़ राज्य बाल कल्याण परिषद द्वारा दिव्यांग बच्चों के विकास, शिक्षा, अधिकारों और पुनर्वास से जुड़े मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने के उद्देश्य से 4 जुलाई 2026 को रायपुर में एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया जाएगा। यह कार्यक्रम न्यू शांति नगर स्थित वीमतारा भवन (स्वदेशी भवन के पास) में सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक आयोजित होगा।
रायपुर प्रेस क्लब में आयोजित प्रेसवार्ता के दौरान परिषद के महासचिव चंद्रेश शाह ने बताया कि सेमिनार में दिव्यांग बच्चों के समग्र विकास, समावेशी शिक्षा, पुनर्वास और उनके अधिकारों से जुड़े विभिन्न विषयों पर विशेषज्ञ अपने विचार साझा करेंगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत दिव्यांग बच्चों के लिए निर्धारित मानकों, अवसरों और योजनाओं पर भी विस्तृत चर्चा की जाएगी।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में छत्तीसगढ़ राज्य बाल कल्याण परिषद के अध्यक्ष एवं रायपुर लोकसभा सांसद बृजमोहन अग्रवाल शामिल होंगे। इसके अलावा विभिन्न विभागों के अधिकारी, शिक्षाविद्, सामाजिक कार्यकर्ता, अभिभावक तथा दिव्यांग बच्चों के हित में कार्य करने वाले संगठनों के प्रतिनिधि भी कार्यक्रम में भाग लेंगे।
सेमिनार में इग्नू के डॉ. आलोक उपाध्याय, बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के योगेंद्र पांडे, सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी सज्जाद नकवी, छत्तीसगढ़ राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग की अध्यक्ष डॉ. वर्णिका शर्मा, अधिवक्ता सुगंधा जैन और डाइटिशियन डॉ. सारिका श्रीवास्तव विषय विशेषज्ञ के रूप में उपस्थित रहेंगे।
महासचिव चंद्रेश शाह ने बताया कि कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य दिव्यांग बच्चों के अधिकारों और उनके विकास से जुड़े मुद्दों पर समाज में जागरूकता बढ़ाना तथा विभिन्न हितधारकों के बीच संवाद स्थापित करना है, ताकि बच्चों को बेहतर अवसर और सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकें।
इस दौरान डॉ. कमल वर्मा ने कहा कि डाउन सिंड्रोम जैसी स्थितियों की पहचान गर्भावस्था के दौरान जांच के माध्यम से संभव है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में जागरूकता और सुविधाओं की कमी के कारण कई मामलों का समय पर पता नहीं चल पाता। उन्होंने मितानिनों और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के माध्यम से गर्भवती महिलाओं की जांच को बढ़ावा देने की आवश्यकता बताई। साथ ही उन्होंने जन्म के बाद छह माह के भीतर बच्चों में संभावित दिव्यांगता की जांच को अनिवार्य किए जाने की मांग भी उठाई।
विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर पहचान, उचित उपचार और पुनर्वास सेवाओं के माध्यम से दिव्यांग बच्चों के जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार किया जा सकता है।

