चाय पर चर्चा : शहर की चाय दुकानों से लेकर सरकारी दफ्तरों तक इन दिनों एक ही चर्चा है—क्या शिक्षा विभाग और आदिम जाति विभाग के कुछ अधिकारियों की कथित मिलीभगत से नियमों को ताक पर रखकर शिक्षकों की अधीक्षक पद पर तैनाती की जा रही है
चर्चा यह है कि आदिम जाति विभाग में पहले से अधीक्षक उपलब्ध होने के बावजूद शिक्षकों को अधीक्षक बनाया जा रहा है। आरोप यह भी लगाए जा रहे हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में कथित रूप से ₹2 लाख तक के लेन-देन का खेल चल रहा है। यदि यह सच है तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था की निष्पक्षता पर भी गंभीर सवाल है।
बताया जा रहा है कि शासन की ओर से पहले ही ऐसे मामलों में शिक्षकों को आदिम जाति विभाग के छात्रावासों में अधीक्षक पद पर पदस्थ नहीं करने के निर्देश दिए जा चुके हैं। इसके बावजूद यदि तैनातियां हो रही हैं, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर किसके संरक्षण में यह सब हो रहा है?
इसी मुद्दे को लेकर आदिम जाति विभाग के अधिकारी और कर्मचारी भी विरोध में उतर आए हैं। उन्होंने शिक्षा विभाग को ज्ञापन सौंपकर मांग की है कि यदि विभाग में नियमित अधीक्षक मौजूद हैं, तो फिर नियमों के विरुद्ध शिक्षकों की नियुक्ति क्यों की जा रही है? क्या यह केवल प्रशासनिक निर्णय है या इसके पीछे कोई और कहानी छिपी है
अब सबसे बड़ा सवाल यही हैक्या सरकार इन आरोपों की निष्पक्ष जांच कराएगी? क्या कथित मिलीभगत और भ्रष्टाचार के आरोपों की सच्चाई सामने आएगी, या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
पत्रकार दीपक तिवारी

