चाय पर चर्चा: कबीरधाम जिले में सहकारिता विभाग के एक ऐसे अधिकारी की चर्चा इन दिनों चाय की टपरी से लेकर दफ्तरों के गलियारों तक हो रही है, जो पिछले 15 वर्षों से जिले में पदस्थ बताए जा रहे हैं। सवाल यह उठ रहा है कि आखिर एक ही व्यक्ति इतने लंबे समय तक एक ही जिले में कैसे बना रहता है? क्या यह सिर्फ संयोग है या फिर इसके पीछे कोई मजबूत तंत्र काम कर रहा है?
चर्चा है कि यही अधिकारी वर्षों से सहकारी समितियों और धान खरीदी केंद्रों के ऑडिट से जुड़ा हुआ है। ऐसे में लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब ऑडिट करने वाला और ऑडिट करवाने वाले वर्षों से एक-दूसरे को भली-भांति जानते हों, तो निष्पक्षता की उम्मीद कैसे की जाए?
विश्वसनीय सूत्रों की मानें तो जिले में हर वर्ष धान खरीदी के दौरान हजारों क्विंटल धान का अंतर सामने आता है। कभी 40 हजार क्विंटल तो कभी 75 हजार क्विंटल तक धान कम पाए जाने की चर्चाएं होती हैं। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इतने बड़े मामलों के बाद भी व्यवस्था में बैठे कुछ चेहरे वर्षों तक जस के तस बने रहते हैं।
चाय की चुस्कियों के बीच लोग कह रहे हैं कि यदि किसी अधिकारी की जड़ें 15 साल में इतनी गहरी हो जाएं कि समितियां, खरीद केंद्र, विभागीय कर्मचारी और प्रभावशाली लोगों से उसका सीधा संपर्क बन जाए, तो फिर कार्रवाई की फाइलें भी शायद रास्ता भटक जाती होंगी। चर्चा तो यहां तक है कि सहकारिता व्यवस्था में बैठे कुछ जिम्मेदार अधिकारियों, समितियों के प्रबंधन और राजनीतिक संरक्षण के बिना इतना लंबा कार्यकाल संभव नहीं होता।
जनता पूछ रही है कि जब सरकार समय-समय पर तबादला नीति बनाती है, तो फिर कुछ अधिकारियों पर यह नीति लागू क्यों नहीं होती? क्या नियम सिर्फ नए कर्मचारियों के लिए हैं और पुराने खिलाड़ियों के लिए अलग व्यवस्था चलती है?
अब देखने वाली बात यह होगी कि शासन और विभाग इस तरह की चर्चाओं को गंभीरता से लेते हैं या फिर आने वाले वर्षों में भी धान घोटालों की खबरें और वही पुराने चेहरे चर्चा का विषय बने रहेंगे।
चाय पर चर्चा है साहब… धान कम होने का रहस्य जितना बड़ा नहीं, उससे बड़ा रहस्य यह है कि आखिर इतने सालों से एक ही कुर्सी पर बैठे लोग हर जांच में कैसे बच जाते हैं! ☕
पत्रकार दीपक तिवारी

