*नेल्सन मंडेला अब नन्दकुमार बघेल!….. संघर्ष जारी हैं !!*
*शब्द बदला हैं “रंगभेद” की जगह “वर्णभेद”, पर संघर्ष वही हैं!*
कमलेश लव्हात्रे/बिलासपुर : महापुरुषों को पैदा करने का काम प्रकृति समय-समय पर बखूबी करता हैं। दक्षिण अफ्रीका में “रंगभेद” के खिलाफ संघर्ष करने वाले नेल्सन मंडेला पूरे विश्व के दलितों और पिछड़ों के मसीहा बने। 95 वर्ष की उम्र में नेल्सन मंडेला का निधन 5 दिसम्बर 2013 ईसवीं को हुआ। ठीक छः महीने बाद 6 जून 2014 ईसवीं दिन शुक्रवार को बाबूजी माननीय नन्दकुमार बघेल ने “वर्णभेद” के खिलाफ अपने संघर्ष को देशव्यापी करने का शंखनाद किया। इससे पहले वर्णव्यवस्था के खिलाफ बाबूजी का संघर्ष छत्तीसगढ़ राज्य तक ही सीमित रहता था। नेल्सन मंडेला का युद्ध “रंगभेद” से था और युद्धास्त्र अंहिसा था जो बुद्ध, गाँधी और अम्बेडकर से प्रेरित था। नन्दकुमार बघेल का युद्ध “वर्णभेद” (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ) से हैं और युद्धास्त्र अहिंसा ही हैं। नेल्सन मंडेला के आन्दोलन को कुचलने के लिए गौरवर्णो ने अनेक षड़यंत्र रचें, कारागार में बन्द करवाया। नन्दकुमार बघेल के आन्दोलन को कुचलने के लिए सवर्णों ने अनेक षड़यंत्र रचें और कारागार में बन्द करवाया… अब भी जारी हैं। बाबूजी नन्दकुमार बघेल जी के संघर्ष को देशव्यापी हुए 7 साल बीत चुके हैं आठवां वर्ष चल रहा है। आज कश्मीर से कन्याकुमारी तक बाबूजी के वैचारिक संघर्ष की गुंज सुनाई दे रही हैं। बाबूजी के लिए पूरा भारत कर्मभूमि और तपोभूमि हैं वहीं कारागार ध्यान और साधना का केन्द्र हैं। जगदीश कौशिक व अनेक समर्थकों ने आग्रह किया हैं कि बाबूजी जमानत ले, जेल से बाहर निकले और संघर्ष को नया आयाम दे।

