Tadmetla Naxal Attack: बिलासपुर: ताड़मेटला नक्सली हमला मामले में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को चुनौती देने वाली राज्य सरकार की अपील को खारिज कर दिया। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा कि हमें यह देखकर अत्यंत दुख हुआ है, इतने गंभीर मामले, जिसमें बड़े पैमाने पर जवान शहीद हुए हैं और राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर परिणाम भुगतने पड़े, का अंततः इस तरह से निपटारा किया गया है, कोई भी कानूनी रूप से मान्य और विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया जा सका। परिणामस्वरूप, निचली अदालत को उन्हें बरी करने के लिए विवश होना पड़ा।
सीआरपीएफ कर्मियों पर हुए सामूहिक हमले के आरोपियों को प्रत्यक्ष साक्ष्यों की कमी, अपूर्ण परिस्थितिजन्य साक्ष्य, जांच में प्रक्रियात्मक खामियों और अपराध की गंभीरता के बावजूद उचित संदेह से परे दोष सिद्ध करने में विफलता के कारण बरी कर दिया गया।
बता दें कि राज्य सरकार ने दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 378 (1) के तहत हत्याकांड के आरोपियों को अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, दक्षिण बस्तर द्वारा सत्र परीक्षण में 07 जनवरी 2013 को पारित निर्णय की वैधता और औचित्य को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। अतिरिक्त सत्र न्यायालय ने अभियुक्तों को आईपीसी की धारा 148, 120बी, 396 (76 गिनती) और शस्त्र अधिनियम की धारा 25, 27 और विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 3, 5 के तहत दंडनीय अपराध से बरी कर दिया था, यह मानते हुए कि अभियोजन पक्ष अपने मामले को उचित संदेह से परे साबित करने में विफल रहा है।
जानिए पूरा मामला
सीआरपीएफ की 62वीं बटालियन के उप कमांडर सत्यवान सिंह, कंपनी और पुलिस बल के साथ 82वीं फोर्स के साथ 04 अप्रैल 2010 से 07 अप्रैल 2010 तक एरिया डोमिनेशन पेट्रोलिंग पर थे, जब 06 अप्रैल 2010 की सुबह ताडमेटला गांव के जंगल में नक्सलियों से मुठभेड़ हुई। पुलिस बल को देखते ही नक्सलियों ने उन्हें जान से मारने की मंशा से भारी गोलीबारी शुरू कर दी, जिसके जवाब में पुलिस ने भी आत्मरक्षा में गोलीबारी की। उक्त गोलीबारी में 76 पुलिसकर्मी शहीद हो गए। इस घटना की रिपोर्ट चिन्तागुफा पुलिस स्टेशन में दर्ज कराई गई है।
सरकार की ओर से महाधिवक्ता ने रखा पक्ष
राज्य शासन की ओर से पैरवी करते हुए महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने कहा, निचली अदालत द्वारा पारित बरी करने का फैसला अवैध और अस्थिर है। निचली अदालत महत्वपूर्ण साक्ष्यों को समझने में विफल रही है, जिसमें आरोपी बरसे लखमा का मजिस्ट्रेट के समक्ष धारा 164 सीआरपीसी के तहत दिया गया इकबालिया बयान भी शामिल है, जिसमें उसने अन्य आरोपियों के साथ इस अपराध में शामिल होने की बात स्वीकार की है। इसके अलावा, निचली अदालत बम निरोधक दस्ते द्वारा जब्त किए गए पाइप बमों और विस्फोटकों तथा अन्य सहायक सामग्री को भी समझने में विफल रही है। धारा 311 सीआरपीसी के तहत सात घायल सीआरपीएफ जवान, जो चश्मदीद गवाह थे, की जांच के लिए अभियोजन पक्ष के आवेदन को खारिज करना एक गंभीर त्रुटि है, जो मामले को कमजोर करती है।
कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य या प्रत्यक्षदर्शी गवाही नहीं
अभियुक्तों को हत्या के कृत्यों के वास्तविक क्रियान्वयन से जोड़ने वाला कोई प्रत्यक्ष साक्ष्य या प्रत्यक्षदर्शी गवाही नहीं है। किसी भी प्रत्यक्षदर्शी ने अभियुक्तों की पहचान अपराधियों के रूप में नहीं की है। धारा 164 दंड प्रक्रिया संहिता किसी स्वतंत्र साक्ष्य द्वारा समर्थित नहीं है। अभियुक्त का कथित इकबालिया बयान, जिसके अंतर्गत जब्त की गई विस्फोटक सामग्री, जिसमें पाइप बम, ग्रेनेड और राइफलें शामिल हैं, घटना स्थल से बरामद की गई थी, न कि आरोपी के कब्जे से। महत्वपूर्ण बात यह है कि सामग्री को विस्फोटक प्रमाणित करने वाली एफएसएल रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई है, जिससे जब्ती का सबूत अप्रभावी हो जाता है। जांच त्रुटिपूर्ण प्रतीत होती है क्योंकि शस्त्र अधिनियम के तहत आवश्यक अभियोजन स्वीकृति का कोई रिकॉर्ड नहीं है।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को दी हिदायत
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, निचली अदालत द्वारा पारित दोषमुक्ति के फैसले के विरुद्ध राज्य द्वारा दायर की गई अपील को खारिज किया जाता है। अभियुक्तों, प्रतिवादियों की दोषमुक्ति को बरकरार रखा जाता है, क्योंकि अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे अपराध साबित करने में विफल रहा है। डिवीजन बेंच ने कहा, जांच में कई खामियां थीं, जैसे महत्वपूर्ण गवाहों की पहचान और जांच न होना, फोरेंसिक और तकनीकी प्रमाणों का अभाव, आरोपी को कथित अपराधों से जोड़ने वाले प्राथमिक साक्ष्यों का संग्रह न होना। मात्र संदेह, चाहे वह कितना भी प्रबल क्यों न हो, अपने आप में संदेह से परे प्रमाण की आवश्यकता का विकल्प नहीं हो सकता।

