Snakebite Compensation Scam: बिलासपुर। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में कथित सर्पदंश मुआवजा घोटाले को लेकर बड़ा प्रशासनिक खुलासा सामने आया है। मामले में प्रशासन ने कार्रवाई तेज करते हुए शहर के चार अलग-अलग थानों में कुल 14 एफआईआर दर्ज कराई हैं। हालांकि मामला संवेदनशील होने के कारण इन प्रकरणों को सिटीजन पोर्टल पर ब्लॉक कर दिया गया है, जिससे विस्तृत जानकारी सार्वजनिक नहीं की जा रही है। इस बीच प्रशासनिक हलकों में कई तहसीलदारों और वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे हैं।
यह मामला तब सामने आया जब बेलतरा विधायक सुशांत शुक्ला ने विधानसभा में आंकड़ों के साथ दावा किया कि बिलासपुर में सर्पदंश से मौतों की संख्या जशपुर जैसे जिले से भी अधिक दर्ज की गई है। इसके बाद शासन ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय जांच के आदेश दिए थे। शुरुआती जांच धीमी रही, लेकिन बाद में शासन के सख्त रुख के बाद जांच को गति मिली और एफआईआर दर्ज करने की प्रक्रिया पूरी की गई। जांच रिपोर्ट के अनुसार बिलासपुर तहसीलदार प्रकाश साहू की जांच के आधार पर कोनी, सरकंडा, कोतवाली और तोरवा थानों में अलग-अलग मामले दर्ज किए गए हैं। फिलहाल पुलिस और प्रशासन ने एफआईआर का विस्तृत विवरण साझा नहीं किया है।
सूत्रों के अनुसार इस पूरे घोटाले में एक संगठित नेटवर्क के जरिए फर्जी सर्पदंश मामलों को तैयार किया गया और प्राकृतिक आपदा राहत राशि का गलत तरीके से लाभ लिया गया। आरोप है कि तहसीलदार के ड्राइवर गोविंद विश्वकर्मा और अधिवक्ता खांडेकर इस नेटवर्क में मुख्य भूमिका में थे। बताया जा रहा है कि अधिवक्ता फर्जी मामलों की पहचान कर उन्हें तैयार करता था, जबकि ड्राइवर ऑनलाइन प्रक्रिया और दस्तावेजी काम संभालता था। जांच में यह भी सामने आया है कि पटवारी प्रतिवेदन, पुलिस की मर्ग रिपोर्ट और पोस्टमार्टम रिपोर्ट जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेजों को कथित रूप से फर्जी तरीके से तैयार किया गया, ताकि प्राकृतिक आपदा राहत राशि आसानी से स्वीकृत हो सके। नियमानुसार सर्पदंश से मृत्यु पर मृतक के परिजनों को चार लाख रुपये की सहायता राशि दी जाती है, लेकिन इस प्रक्रिया का गलत उपयोग कर वित्तीय अनियमितता की गई।
प्राकृतिक आपदा राहत की स्वीकृति प्रक्रिया बहुस्तरीय होती है, जिसमें पटवारी, तहसीलदार, एसडीएम और कलेक्टर स्तर तक दस्तावेजों की जांच और अनुमोदन शामिल होता है। इसके बावजूद बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े के आरोप सामने आने से प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जांच के दायरे में कुछ पूर्व और वर्तमान अधिकारियों के नाम भी सामने आ रहे हैं, जिनमें मुकेश देवांगन, शेषनारायण जायसवाल, अतुल वैष्णव, गरिमा ठाकुर और प्रकृति ध्रुव जैसे नाम चर्चा में हैं। इसके अलावा एक वरिष्ठ जिला अधिकारी की भूमिका भी संदिग्ध बताई जा रही है, हालांकि अभी किसी पर आधिकारिक आरोप तय नहीं किए गए हैं।

