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चाय पर चर्चा: मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के पत्र भी बेअसर! आखिर किसके इशारे पर चल रही है तबादला-पोस्टिंग की व्यवस्था

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Discussion on tea: Letters from the Chief Minister and the state president are also ineffective! After all, at whose behest is the system of transfer-posting being run

छत्तीसगढ़ की सत्ता के गलियारों में इन दिनों एक ऐसी चर्चा जोर पकड़ रही है, जो भारतीय जनता पार्टी के संगठन और सरकार दोनों के लिए चिंता का विषय हो सकती है। सवाल यह है कि क्या सरकार में अब मुख्यमंत्री और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की सिफारिशों का भी पहले जैसा महत्व नहीं रह गया है

चर्चा है कि मुख्यमंत्री और भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की ओर से भी कुछ अधिकारियों-कर्मचारियों के तबादले को लेकर पत्र लिखे गए, लेकिन उन पत्रों को मंत्रियों के स्तर पर अपेक्षित महत्व नहीं मिलने की बातें सामने आ रही हैं। यदि प्रदेश के सर्वोच्च राजनीतिक नेतृत्व और संगठन के प्रमुख की अनुशंसा के बाद भी कार्यकर्ताओं की बात नहीं सुनी जा रही, तो फिर आम कार्यकर्ता किस दरवाजे पर दस्तक दे

अब सवाल सिर्फ तबादले का नहीं, सत्ता के भीतर चल रही व्यवस्था का है।

प्रदेश में ऐसी शिकायतें और चर्चाएं लगातार सुनने को मिल रही हैं कि किसी भी विभाग में तबादला-पोस्टिंग कराना हो, तो केवल आवेदन देने या किसी जनप्रतिनिधि की अनुशंसा से काम नहीं बनता। लोगों को कथित तौर पर किसी मध्यस्थ का सहारा लेना पड़ता है। यहां तक कि राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि अलग-अलग मंत्रियों के यहां काम कराने के लिए अलग-अलग प्रभावशाली लोगों तक पहुंच बनानी पड़ती है।

स्वास्थ्य विभाग में डॉक्टरों के छोटे जिलों से रायपुर आने के लिए सात लाख रुपये तक की कथित मांग, आबकारी विभाग में ढाई से तीन लाख रुपये और पुलिस विभाग में आईटीआई से जुड़े तबादलों के लिए दस लाख रुपये तक की चर्चाएं हो रही हैं। दूसरे विभागों में भी अलग-अलग रकम के दावे सामने आ रहे हैं। इन आरोपों की पुष्टि जांच और दस्तावेजों से होनी चाहिए, लेकिन इन चर्चाओं ने सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि भाजपा का वह कार्यकर्ता, जिसने चुनाव के दौरान पार्टी के लिए मेहनत की, आज अपने काम के लिए मंत्रियों के बंगलों के चक्कर लगा रहा है। आवेदन लिया जाता है, आश्वासन मिलता है, लेकिन काम कब होगा, इसकी कोई समय-सीमा नहीं।

जब मुख्यमंत्री और प्रदेश अध्यक्ष के पत्रों को लेकर ही अपेक्षित कार्रवाई नहीं होने की चर्चा है, तो फिर छोटे कार्यकर्ताओं और आम नागरिकों की सिफारिशों की क्या हैसियत रह जाती है

क्या सरकार में संगठन कमजोर हो रहा है और कुछ चुनिंदा मध्यस्थ ताकतवर होते जा रहे हैं

यह सवाल भाजपा के भीतर भी आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। क्योंकि पार्टी की ताकत उसका संगठन और कार्यकर्ता हैं, न कि सत्ता के आसपास सक्रिय कुछ चुनिंदा चेहरे।

जनता की स्थिति भी इससे अलग नहीं है। आम आदमी अपनी समस्या लेकर मंत्री के बंगले जाता है, आवेदन देता है और वापस लौट आता है। उसे कहा जाता है कि काम हो जाएगा। लेकिन जब वही व्यक्ति किसी प्रभावशाली मध्यस्थ के जरिए पहुंचता है, तो काम होने की उम्मीद बढ़ जाती है। यदि ऐसी व्यवस्था वास्तव में बन रही है, तो यह सुशासन की भावना के बिल्कुल विपरीत है।

2023 में बनी सरकार से जनता ने व्यवस्था बदलने की उम्मीद की थी। लेकिन अब 2028 की राजनीतिक जमीन तैयार होने से पहले ही अगर कार्यकर्ताओं में असंतोष, जनप्रतिनिधियों में नाराजगी और आम जनता में निराशा बढ़ रही है, तो भाजपा नेतृत्व को इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए।

क्योंकि चुनाव में केवल मंत्री और संगठन के बड़े चेहरे नहीं उतरते, बूथ का कार्यकर्ता भी उतरता है। और जब वही कार्यकर्ता निराश होगा, तो चुनावी परिणामों पर उसका असर पड़ना स्वाभाविक है।

अब मुख्यमंत्री से सवाल है कि क्या मंत्रियों के यहां आने वाले अनुशंसा पत्रों की कोई जवाबदेही तय होगी क्या प्रदेश अध्यक्ष संगठन के कार्यकर्ताओं की शिकायतों को गंभीरता से लेंगे क्या तबादला-पोस्टिंग की प्रक्रिया को पारदर्शी बनाया जाएगा, ताकि किसी मध्यस्थ की जरूरत न पड़े

☕ चाय की आखिरी चुस्की के साथ एक बड़ा सवाल…

अगर मुख्यमंत्री का पत्र, प्रदेश अध्यक्ष की अनुशंसा और भाजपा के समर्पित कार्यकर्ता की फरियाद भी मंत्रियों के दरवाजे पर प्रभावहीन हो जाए, तो फिर सरकार में आखिर किसकी चल रही है

सत्ता जनता के लिए है, कार्यकर्ताओं के विश्वास के लिए है या फिर कुछ चुनिंदा लोगों के प्रभाव के लिए

2028 अभी दूर है, लेकिन जनता और कार्यकर्ताओं के मन में उठ रहे सवालों का जवाब आज ही देना होगा।

☕ चाय पर चर्चा जारी है… बात कड़वी जरूर है, लेकिन सवाल व्यवस्था से है। पत्रकार दीपक तिवारी

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