It’s a festival, brother, there is at least a little adulteration! Death packed in sweet boxes and ‘Kumbhakarni’ slept in sleep administration
बालोद |( जिला ब्यूरो फिलिप चाको) त्योहार आते ही बाजार ऐसे सज धज जाते हैं मानो खुशियों की कोई नुमाइश लगी हो। दुकानों पर रंग-बिरंगी मिठाइयों के ऐसे पहाड़ खड़े होते हैं जिन्हें देखकर डायबिटीज के मरीज का भी ईमान डोल जाए। दुकानदार ऐसे मुस्कराते हैं जैसे वे मेवा नहीं, भगवान का प्रसाद बांट रहे हों। उनकी जुबान की मिठास शहद को भी मात दे दे— “अरे भाई साहब, बिल्कुल शुद्ध खोया है, घर का बना घी है!”
ग्राहक भी बेचारा क्या करे? दफ्तर का तनाव, घर में त्योहार की लंबी फेहरिस्त और ऊपर से समय की कमी। वह दुकानदार की इस ‘जुबानी गारंटी’ पर ऐसा भरोसा कर लेता है जैसे वह कोई वेद वाक्य हो। डिब्बा भरवाता है, पैसे फेंकता है और खुशी-खुशी घर ले आता है—यह सोचे बिना कि उस डिब्बे में मिठास के साथ-साथ किसी अस्पताल का एडवांस बिल भी पैक हो रहा है!
*दुकानदार मस्त, ग्राहक अस्त-व्यस्त, और खाद्य विभाग… ‘मोक्ष’ में है!*
जरा सोचिए, जिस वक्त पूरा शहर त्योहार की उमंग में डूबा होता है, आपकी थाली में सजी वह खूबसूरत मिठाई असल में किस भट्ठी से, किस सड़े हुए पाम ऑयल और सिंथेटिक रंगों से बनकर आई है, इसकी सुध लेने वाला कोई है क्या?
त्योहारों पर मिलावटखोरों की चांदी कटती है और आम आदमी की सेहत ताक पर रख दी जाती है। लेकिन हमारे खाद्य सुरक्षा विभाग के महानुभावों की स्थिति देखकर तो यही लगता है कि वे शायद किसी गुप्त तपस्या में लीन हैं। उन्हें लगता है कि मिलावटखोर भी बड़े संस्कारी होते हैं जो त्योहार देखकर खुद-बखुद शुद्ध दूध और असली मावे का इस्तेमाल करने लगेंगे!
दुकानों पर छापे पड़े या नहीं? कितने नमूने लिए गए? कौन सा खोया प्रयोगशाला भेजा गया? इन सवालों के जवाब ऐसे गायब रहते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। विभाग की यह ‘मूक स्वीकृति’ देखकर ऐसा लगता है मानों उनका आधिकारिक नारा यह हो—
“खाओ पियो और अस्पताल जाओ, हम तो बस कुंभकर्णी नींद के मजे लेंगे!”
रंग-बिरंगे धोखे और कागजी कानून
वो मिठाइयां जो दूर से आपका दिल ललचाती हैं, उनके पास कोई बोर्ड नहीं लगा होता कि— “सावधान! इसमें केमिकल और अरारोट का भरपूर मिश्रण है।” ऊपर से पैकेट पर बड़े-बड़े अंग्रेजी के शब्दों में ब्रांडिंग देख कर ग्राहक और भ्रमित हो जाता है।
कानून की किताबें कहती हैं कि हमारे देश में खाद्य सुरक्षा एवं मानक
अधिनियम, 2006 नाम की कोई चिड़िया है। कानून की धारा 26 से लेकर धारा 59 तक मिलावटखोरों के लिए बड़े-बड़े दंडों का प्रावधान करती हैं। धाराएं कहती हैं कि असुरक्षित या घटिया सामान बेचने वालों की खाल खींच ली जाएगी।
पर साहब, खाल खींचेगा कौन? जब तक विभाग के कान पर जूं रेंगेगी, तब तक तो ग्राहक त्योहार की मिठास के चक्कर में ड्रिप (Glucose) की बोतलों के सहारे अस्पताल के बिस्तर की शोभा बढ़ा रहा होगा।
क्या अब की दीपावली पर मिठाई की जगह ‘फूलमाला’ खरीद रहे हैं आप?
मान लीजिए, त्योहार के जोश में आपने बच्चों को महंगी मिठाइयां खिला दीं और शाम तक घर में उल्टियां शुरू हो गईं। तब आप क्या करेंगे? डॉक्टर के पास दौड़ेंगे, बिल संभालेंगे और अपनी किस्मत को कोसेंगे।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन की नींद तभी खुलेगी जब कोई उठने लायक नहीं बचेगा? क्या बीमारी के बाद एक्शन लेना ही प्रशासन की इकलौती योग्यता रह गई है? बीमारी की नौबत ही न आए, इसके लिए अग्रिम चेकिंग करने की जिम्मेदारी किसकी है?
जागरूकता जरुरी दुर्घटना से देर भली: कागजी कार्रवाई बंद हो, शहर में छापे पड़ें गुणवक्ता की जाँच हो !
भोले भाले लोगो के सेहत से खिलवाड़ बंद हो :
* सैंपलिंग हो: त्योहारी सीजन के नाम पर शहर की हर संदेहास्पद दुकान से मिठाइयों के नमूने लेकर सरकारी लैब में भेजे जाएं।
* नतीजे सार्वजनिक हों: जांच के नतीजे कागजों में दफन न रहें, बल्कि जनता के सामने आएं ताकि दूध का दूध और पानी का पानी हो सके।
* ईमानदारों को राहत, बेईमानों पर आफत: उन मेहनती और ईमानदार दुकानदारों को परेशान न किया जाए जो वाकई शुद्धता का ध्यान रखते हैं, बल्कि उन मिलावटखोरों के के उची पहुंच पर भी हाथ डाला जाए जो जनता की सेहत से खिलवाड़ कर रहे हैं।
बस सवाल इतना सा
इस दीपावली पर अपनों का मुंह मीठा करवा रहे हैं या अपने ही हाथों से उन्हें अस्पताल का टिकट थमा रहे हैं? या अपने प्रियों को तस्वीर मे टांगने की तैयारी मे है?
त्योहार खुशियों का है, मातम का नहीं। इसलिए जागिए, थोड़ा सजग बनिए, और प्रशासन को भी उसकी गहरी नींद से झकझोर कर जगाइए—क्योंकि अंत में ‘जिंदगी और सेहत’ किसी भी त्योहार से कहीं ज्यादा कीमती है!

