Acid attack in Balod: When the law took the lead and morality weaved a new fabric
बालोद ( संवाददाता फिलिप चाको ): बालोद में एक बार फिर कानून के राज, जनता के उबाल और व्यवस्था की ‘विशेष कृपा’ का त्रिवेणी संगम देखने को मिला। खबर है कि एसिड अटैक के दो महान एकतरफा प्रेम विभाग के स्थायी सदस्य को जब बालोद पुलिस न्यायालय लेकर पहुँची, तो जनता ने उनका स्वागत कोई फूल-मालाओं से नहीं, बल्कि “फांसी दो, फांसी दो” के गगनभेदी पुर जोर नारों से किया।
लोग इतने ‘आग बबूला’ हो गए कि अगर बालोद पुलिस बीच में ना आती और धक्का-मुक्की झेलते हुए मोर्चा ना संभालती, तो शायद न्याय का फैसला न्यायालय के कमरे तक पहुँच ही नहीं पाता! पुलिस ने दोनों आरोपियों को सकुशल न्यायिक अभिरक्षा में भिजवा दिया है और BNS की धारा 124/1 के तहत कार्यवाही की रस्म शुरू कर दी गई है। कानून में तो प्रावधान 10 साल से लेकर आजीवन कारावास और अर्थदंड का है—बाकी अंतिम मोहर तो हमारे सिस्टम के समय-चक्र पर निर्भर करती है।
*योजना 3 महीने पुरानी, पर ‘विश्वासपात्र साथी’ मिलने में हुई देरी*
सूत्रों की मानें तो मुख्य आरोपी ‘यश’ महोदय पिछले तीन महीनों से इस महान षड्यंत्र का मन बनाए बैठे थे। पर अफ़सोस, एक अदद ऐसा ‘विश्वासयोग्य साथी’ ढूँढने में उन्हें देर हो गई जो इस घिनौने काम में बराबरी की नादानी दिखा सके। जैसे ही जोड़ी जमी, कांड को अंजाम दे दिया गया!
*वकील साहब का हस्ताक्षर अभियान और कानूनी त्याग—‘फीस’ से बड़ा हुआ इंसानियत का सवाल!*
इधर वरिष्ठ अधिवक्ता दीपक सामटकर ने इस जघन्य अपराध को ‘घिनौना कृत्य’ करार देते हुए बुद्धिजीवी अधिवक्ताओं के साथ विचार-विमर्श का मोर्चा संभाल लिया है। चर्चा अब सिर्फ अदालत में दलील देने तक सीमित नहीं, बल्कि इस सवाल तक पहुंच गई है कि क्या हर अपराधी को कानून की किताब का सहारा मिलेगा, लेकिन इंसानियत की आवाज को कोई नहीं सुनेगा?
अधिवक्ताओं के बीच यह निर्णय सामने आया है कि इस अमानवीय कृत्य के आरोपियों की पैरवी से दूरी बनाई जाएगी। यानी जिस पेशे में ‘मुवक्किल’ और ‘फीस’ रोजमर्रा की जरूरत मानी जाती है, वहां वकीलों ने फिलहाल फीस की जगह फर्ज को आगे रख दिया है।
*व्यंग्य की भाषा में कहें तो* —आज अदालत के बाहर एक ऐसी ‘केस डायरी’ तैयार हो रही है, जिसमें आरोपी का नाम तो है, लेकिन उसकी पैरवी के लिए वकील का नाम तलाशना मुश्किल हो सकता है।
यह फैसला किसी कानूनी प्रक्रिया को रोकने का प्रयास नहीं, बल्कि समाज के सामने एक नैतिक सवाल खड़ा करने वाली पहल के रूप में देखा जा रहा है। वकीलों का कहना है कि न्यायपालिका का सम्मान तभी कायम रहेगा, जब कानून के साथ-साथ समाज की संवेदनशीलता भी जिंदा रहे।
अब गेंद सिर्फ पुलिस और अदालत के पाले में नहीं है। समाज के पाले में भी है। क्योंकि अपराध होने के बाद आरोपी को पकड़ना पुलिस का काम है, सजा देना अदालत का काम है, लेकिन अपराध की मानसिकता को जड़ से खत्म करना पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
बालोद जैसे शांत शहर में यदि अपराध की ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, तो यह सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी की घंटी है। उम्मीद है कि अधिवक्ताओं का यह कदम जनमानस को भी सोचने पर मजबूर करेगा कि बच्चों को सिर्फ पढ़ाई और नौकरी के लिए नहीं, बल्कि रिश्तों का सम्मान, ‘ना’ का अर्थ और इंसानियत का पाठ पढ़ाना भी उतना ही जरूरी है।
क्योंकि अदालत में कानून आरोपी को सजा दे सकता है, लेकिन समाज को बदलने की जिम्मेदारी हम सबकी है।
तेज़ाब, नशा और ‘बड़ी मछलियों’ की अमर कथा
इस घटना ने बालोद की जागरूक जनता के सामने कई बेहद ‘नवेले’ और ‘अकल्पनीय’ सवाल खड़े कर दिए हैं—
घातक एसिड और नशे की सामग्री आसानी से कैसे मिलती है? (जैसे बाज़ार में धनिया-मिर्च मिलता है!)
हर बार कार्यवाही में ‘बड़ी मछलियां’ जाल फाड़कर कैसे निकल जाती हैं? और सिर्फ छोटे-मोटे प्यादे ही कानून के शिकंजे में क्यों फँसते हैं?
इन यक्ष प्रश्नों के उत्तर शायद किसी के पास नहीं हैं, इसलिए विद्वानों का सुझाव है कि केवल ‘सभ्य समाज’ की सुंदर-सुंदर बातें करने से काम नहीं चलेगा। जागरूक नागरिक होने के नाते आपकी और हमारी यह नैतिक ज़िम्मेदारी बनती है कि किसी भी गलत या संदिग्ध गतिविधि की जानकारी तुरंत 112 या पास के पुलिस थाने में दें।
आखिरकार,जब तक समाज स्वयं जागकर अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा, तब तक कानून की लाठी और सिस्टम के ‘आसानी से उपलब्ध तेज़ाब’ के बीच का यह संतुलन ऐसे ही बना रहेगा!
अब गेंद सिर्फ पुलिस और अदालत के पाले में नहीं है। समाज के पाले में भी है। क्योंकि अपराध होने के बाद आरोपी को पकड़ना पुलिस का काम है, सजा देना अदालत का काम है, लेकिन अपराध की मानसिकता को जड़ से खत्म करना पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
8 घंटे में एसिड अटैक के आरोपियों तक पहुंची बालोद पुलिस
बालोद जैसे शांत शहर में यदि अपराध की ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं, तो यह सिर्फ एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी की घंटी है। उम्मीद है कि अधिवक्ताओं का यह कदम जनमानस को भी सोचने पर मजबूर करेगा कि बच्चों को सिर्फ पढ़ाई और नौकरी के लिए नहीं, बल्कि रिश्तों का सम्मान, ‘ना’ का अर्थ और इंसानियत का पाठ पढ़ाना भी उतना ही जरूरी है। क्योंकि अदालत में कानून आरोपी को सजा दे सकता है, लेकिन समाज को बदलने की जिम्मेदारी हम सबकी है।
बालोद पुलिस और एसपी साहब का ‘सुपरफास्ट एक्शन’—तारीफ तो बनती है!
इस पूरे घटनाक्रम में अगर किसी ने अपने फर्ज को पूरी शिद्दत और प्रोफेशनलिज्म से निभाया है, तो वह है बालोद जिला पुलिस बल:
एसपी साहब की कड़क कमान: घटना की गंभीरता को देखते हुए बालोद एसपी किरण चव्हाण ने जिस तरह खुद मोर्चा संभाला और ताबड़तोड़ कार्रवाई के निर्देश दिए, उसने साफ़ कर दिया कि अपराधियों के लिए जिले में कोई सुरक्षित ठिकाना नहीं है।
एसडीओपी और थाना प्रभारी का ऑन-फील्ड एक्शन
अपराध घटित होते ही एसडीओपी विनय कुमार और थाना प्रभारी शिशुपाल सिन्हा और उनकी टीम ने बिना एक सेकंड गंवाए सबूत जुटाए और आरोपियों को दबोचकर सलाखों के पीछे पहुंचा दिया।
उग्र भीड़ के बीच ‘सिंघम’ स्टाइल कंट्रोल:* अदालत परिसर में जब आक्रोशित जनता कानून हाथ में लेने पर उतारू थी, तब पूरी पुलिस टीम ने जिस धैर्य, साहस और कड़ाई का परिचय दिया, वह काबिले-तारीफ है। पुलिस ने न सिर्फ कानून का राज कायम रखा, बल्कि आरोपियों को उनके सही अंजाम (जेल) तक पहुँचाया।
आखिरकार,जब तक समाज स्वयं जागकर अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा, पुलिस ने अपना काम रिकॉर्ड समय में पूरा करके मिसाल पेश की है और अब न्याय की घड़ी अदालत में चलेगी। लेकिन इस पूरी घटना का सबसे कड़वा सच समाज के लिए है—
पुलिस और कानून तो अपना फर्ज निभा रहे हैं, लेकिन हम समाज के तौर पर अपने बच्चों को ‘ना’ सुनने और बर्दाश्त करने की तमीज कब सिखाएंगे? जब तक समाज स्वयं नहीं जागेगा, तब तक पुलिस की कड़क लाठी और अपराधियों की घटिया सोच के बीच यह जंग चलती रहेगी।
तब तक कानून की लाठी और सिस्टम के ‘आसानी से उपलब्ध तेज़ाब’ के बीच का यह संतुलन ऐसे ही बना रहेगा!
“सिरफिरे आरोपी चाहे कितने भी शातिर हों, बालोद पुलिस की सतर्कता के आगे उनका हर पैंतरा फेल है—लेकिन असली सवाल अब भी समाज की खामोशी पर बरकरार है!”

