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आवर्ती चराई विकास से नयापारा का बदल रहा स्वरुप, मवेशियों के लिए हरे चारे के साथ छायादार आश्रय की व्यवस्था

बालकृष्ण मिश्रा/सुकमा : राजामुण्डा के नयापारा में आवर्ती चराई विकास से यहाँ के पशुपालकों और महिलाओं को सीधा लाभ मिल रहा है। गांव के समस्त पशुपालक अपने मवेशियों को चराई केन्द्र में लाते हैं। जिससे वे निंश्चिंत होेकर कृषि कार्यों में अपना समय लगा पाते हैं। केन्द्र में मवेशियों के लिए हरे चारे के साथ छायादार आश्रय निर्मित किया गया है। वहीं केन्द्र की साफ सफाई और रखरखाव का जिम्मा गांव की लक्ष्मी महिला स्व सहायता समूह को सौंपा गया हैं जिसमें 10 महिलांए हैं। साफ सफाई का जिम्मा उठाने के साथ साथ महिला समूह द्वारा यहाँ मल्टी एक्टीवीटी केन्द्र में वर्मी कम्पोस्ट का निर्माण और साग सब्जी का उत्पादन कर आर्थिक लाभ कमा रहीं हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक गतिविधियों को गति प्रदान करने के लिए प्रारंभ की गई छत्तीसगढ़ शासन की महत्वाकांक्षी नरवा गरवा घुरुवा बारी योजना के क्रियान्वयन से लोगों के जीवन मे बदलाव और जीवन स्तर में सुधार नजर आ रहा है। नरवा गरवा घुरुवा बारी योजना से एक ओर जहाँ कृषि, पशुपालन और जल संवर्धन को सहारा मिला तो वहीं दूसरी ओर क्षेत्र के ग्रामीणों को रोजगार के नए साधन उपलब्ध होने से आर्थिक विकास में उन्नति सुनिश्चित हुई है। सुकमा जिले में इस योजना का प्रभाव साफ तौर पर नजर आता है। योजना अंतर्गत आवर्ती चराई केन्द्र की स्थापना की जा रही है। सुकमा परिक्षेत्र के अन्तर्गत ग्राम पंचायत राजामुण्डा के ग्राम उदलातरई नयापारा में आवर्ती चराई केन्द्र की स्थापना की गई है।

सब्जी उत्पादन से महिला समूहों को मिला आर्थिक आय का साधन
उदलातरई के आवर्ती चाराई प्रक्षेत्र को भी जिले में संचालित अन्य गोठानों की तरह मल्टी एक्टीवीटी केन्द्र के रुप में स्थापित किया गया है। जिससे यहाँ मवेशियों की बेहतर देखरेख के साथ ही गोबर से वर्मी कम्पोस्ट खाद का निर्माण और महिला समूह के माध्यम से सब्जी उत्पादन का कार्य भी किया जा रहा है। सब्जी उत्पादन से नयापारा की महिला समूह को आर्थिक लाभ कमाने का साधन उपलब्ध हुआ है। मल्टीएक्टीवीटी केन्द्र के तहत लगभग एक हेक्टेयर क्षेत्र में लक्ष्मी स्व सहायता समूह की महिलाओं के द्वारा सब्जी उत्पादन किया जा रहा है। कोरोन काल के दौरान समूह के द्वारा लौकी, ककड़ी, कद्दू, करेला, बरबट्टी, बैगन, भिण्डी आदि सब्जियाँ स्थानीय स्तर पर विक्रय कर 80 हजार की आमदनी की गई। इसके साथ ही महिलाओं को मशरुम उत्पादन का प्रशिक्षण भी दिया जा रहा है, जिससे आगामी समय में वे मशरुम उत्पादन से भी आर्थिक लाभ कमा सकेंगी।

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