Paper is someone’s, someone’s throne’… Is the business of ‘rent’ dwarfed by ‘influence’ on a pile of gunpowder?
(जिला ब्यूरो फिलिप चाको)
*बालोद।* त्योहारों की आहट के साथ ही हवा में आतिशबाजी का सुरूर घुलने लगता है। लाखों-करोड़ों के इस झिलमिलाते कारोबार में ‘सुरक्षा’ का दीया जल रहा है या नियमों की बलि चढ़ाई जा रही है, यह देखना प्रशासन के लिए शायद ‘त्योहारी छुट्टी’ के बाद का विषय है!
एक बड़ा ही बुनियादी लेकिन कड़वा सवाल—दुकान की गद्दी पर बैठा जो शख्स आपको मुस्कुराकर पटाखा बेच रहा है, क्या कानून की नजर में वही उस बारूद का जिम्मेदार है? या फिर कहानी वही पुरानी है: “लाइसेंस किसी ‘खास’ के नाम पर, और गद्दी पर जलवा किसी ‘अजनबी’ का!”
विस्फोटक पदार्थों का कारोबार कोई मिठाई की दुकान नहीं है, जहाँ लाइसेंस किसी का हो और छेना कोई और बेचे। यहाँ लापरवाही की एक चिनगारी सीधे जवाबदेही के चिथड़े उड़ा देती है।
1. ‘लाइसेंस मेरा, धंधा तेरा’—क्या यह मुफ़्त की ‘लीज़’ है?
भारत के विस्फोटक नियम 2008 (Explosives Rules, 2008) के तहत स्थायी पटाखा दुकानों के लिए FORM LE-5 का लाइसेंस अनिवार्य होता है। नियम बेहद साफ-सुथरी भाषा में कहते हैं कि लाइसेंस कोई ‘हस्तांतरणीय संपत्ति’ या किराये पर चढ़ाने वाली ‘मकान की चाबी’ नहीं है जिसे जिसे मर्जी सौंप दिया जाए।
* पश्नों का तकाजा: अगर लाइसेंसधारी साहब घर पर आराम फरमा रहे हैं और उनकी जगह कोई ‘किरायेदार’ बारूद का मुनीम बना बैठा है, तो क्या इसे ‘सक्षम प्राधिकारी की लिखित अनुमति’ माना जाए या फिर विभाग की ‘मौन सहमति’?
* कानूनी पेंच: यह जांच का विषय है कि क्या दुकान में बैठा व्यक्ति महज एक ‘अधिकृत कर्मचारी’ है या लाइसेंस को ‘सब-लेट’ (Sub-let) करके स्वतंत्र रूप से मुनाफा कमाया जा रहा है?
‘अस्थायी’ पर ‘सुपरफास्ट’, ‘स्थायी’ पर ‘पैसेंजर’… रसूख या ‘लक्ष्मी कृपा’?
इस पूरी पड़ताल में एक और अहम पहलू सामने आया है, जो प्रशासन की निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करता है। जिले में अक्सर देखा जाता है कि त्योहारों के दौरान लगने वाली अस्थायी पटाखा दुकानों पर तो प्रशासन पूर्व में जिस तेजी से कार्यवाही करता आया है, उतनी ही धीमी गति स्थायी गोदामों और दुकानदारों पर नज़र आती है।
यह विरोधाभास आखिर क्या संकेत देता है? क्या स्थायी दुकानदारों के भारी-भरकम ‘रसूख’ के आगे सारे नियम-कायदे बौने तो नहीं हो गए हैं? या फिर इन पर ‘लक्ष्मी जी की ऐसी विशेष कृपा’ बरस गई है, जिसके चलते सुरक्षा के कड़े नियम सिर्फ फाइलों में धरे के धरे रह गए हैं? या फिर कड़वी सच्चाई यह है कि विभाग सब कुछ जानकर भी अपनी ‘आँखें बंद’ करने में ही अपनी भलाई समझ रहा है?
आखिर बिल्ली के गले में घंटी बांधने का जोखिम उठाए भी कौन? यही वजह है कि “सावधानी हटी और खीर-पूड़ी बटी” का राग अलापने वाले स्वयं दबी जुबान में ये कहते नजर आ रहे हैं कि “कोई दुर्घटना होगी तब देखेंगे”, लेकिन तब तक रसूखदारों का ‘बारूद-व्यापार’ नियमों को अंगूठा दिखाकर फलता-फूलता रहेगा।
2. दुकान या बारूद का गोदाम? 2026 के नए नियम और ‘पुराने पाप’
विस्फोटक नियम 2008 का नियम 83 चिल्ला-चिल्लाकर कहता है कि स्थायी दुकान का ढांचा कैसा होना चाहिए। ऊपर से 2 मार्च 2026 की केंद्रीय अधिसूचना (G.S.R. 154(E)) ने तो सुरक्षा के धागे और कस दिए हैं।
नए और सख्त प्रावधानों की फेहरिस्त:
* दुकान का संचालन केवल स्वतंत्र एक मंजिला भवन में हो।
* निर्धारित क्षेत्रफल, खुली दूरी और स्वतंत्र प्रवेश-निकास।
* अग्निशमन उपकरण, फायर डिटेक्शन, अलार्म सिस्टम, वाटर स्प्रिंकलर और आवश्यक पंप।
* सुरक्षित वायरिंग के साथ समयबद्ध इलेक्ट्रिकल ऑडिट।
* स्कूल, अस्पताल, डायग्नोस्टिक सेंटर और धार्मिक स्थलों से 50 मीटर की अनिवार्य दूरी।
> ध्यान देने योग्य बात: 2026 की नई अधिसूचना में कुछ पुरानी (पूर्व से FORM LE-5 धारक) दुकानों के लिए दूरी संबंधी शर्तों में कुछ अपवाद (Exceptions) दिए गए हैं। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन अपवादों की आड़ में ‘नियमों की धज्जियां’ उड़ाने का लाइसेंस मिल गया है? पुराने और नए लाइसेंसों की अलग-अलग जांच आखिर किस ‘शुभ मुहूर्त’ में होगी?
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3. लाल डिब्बे का ‘अग्निशमन यंत्र’—सुरक्षा का उपाय या सिर्फ ‘फोटो फ्रेम’?
ज्यादातर दुकानों के कोने में धूल फांकता हुआ एक लाल रंग का फायर एक्सटिंग्विशर (अग्निशमन यंत्र) टांग दिया जाता है और मान लिया जाता है कि दुकान ‘सुरक्षित’ हो गई।
क्या जिले की स्थायी दुकानों का कोई वास्तविक अग्नि सुरक्षा ऑडिट (Fire Safety Audit) हुआ है? क्या अग्निशमन विभाग के अधिकारियों ने मौके पर जाकर स्प्रिंकलर चलाकर देखे हैं? या फिर निरीक्षण के नाम पर सिर्फ ‘कागजी दस्तखत’ का आदान-प्रदान ही सुरक्षा की गारंटी बन गया है?
4. GST का खेल: माल किसका, बिल किसका, कमाई किसकी?
पटाखों पर 18% GST लागू है। लेकिन अगर बिलों की तह में जाएं तो गणित और भी दिलचस्प हो जाता है:
* लाइसेंस है श्री ‘क’ के नाम।
* होलसेल खरीद का GST बिल आ रहा है ‘ख’ ट्रेडर्स के नाम।
* और दुकान में बैठकर कैश गिन रहा है श्री ‘ग’!
यदि लाइसेंसधारी, GST पंजीयन, स्टॉक रजिस्टर और खरीद-बिक्री के बिल आपस में मेल नहीं खाते, तो फिर यह सिर्फ विस्फोटक कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि कर चोरी और बेनामी कारोबार का भी सीधा मामला बनता है।
5. अस्थायी दुकानें: मैदान ‘स्वीकृत’ है या ‘सुविधाजनक’?
Explosives Rules, 2008 के नियम 84 के तहत अस्थायी पटाखा दुकानों (जो त्योहारों पर कुछ दिनों के लिए लगती हैं) का संचालन होता है।
स्कूल के मैदानों, भीड़भाड़ वाले चौराहों और संकरी गलियों में रंग-बिरंगे टेंट लगाकर चलने वाली इन दुकानों के पास क्या सचमुच सुरक्षा की कोई ठोस रणनीति होती है? या फिर ‘अस्थायी अनुमति’ को ‘अस्थायी सुरक्षा’ मानकर छोड़ दिया गया है?
6. जिला प्रशासन से 9 सीधे और तीखे सवाल
जिला प्रशासन, पुलिस, अग्निशमन विभाग और विस्फोटक लाइसेंसिंग प्राधिकारी (Explosives Licensing Authority) को कागजी नींद से जागकर इन सवालों के जवाब जनता के सामने स्पष्ट करने चाहिए:
* जिले में कुल कितनी स्थायी और कितनी अस्थायी पटाखा दुकानें पंजीकृत हैं?
* इनमें से कितनी दुकानों के पास वैध और अद्यतन (Updated) FORM LE-5 लाइसेंस है?
* क्या दुकान पर बैठने वाला वास्तविक कारोबारी और लाइसेंसधारी कागजों में एक ही व्यक्ति हैं?
* यदि किसी लाइसेंस का हस्तांतरण या संचालन बदला है, तो क्या उसमें सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति ली गई है?
* क्या हाल ही में इन दुकानों का भौतिक (Physical) और अग्नि सुरक्षा निरीक्षण किया गया है?
* क्या 2026 के संशोधित सुरक्षा प्रावधानों (G.S.R. 154(E)) का कड़ाई से पालन कराया जा रहा है?
* क्या GST विभाग ने खरीद-बिक्री के बिलों और वास्तविक स्टॉक का मिलान किया है?
* आखिर क्यों स्थायी दुकानों की सुरक्षा और वैधानिकता पर प्रशासन की कार्यवाही इतनी ‘धीमी’ है?
* नियमों की धज्जियां उड़ाने वाले ‘नामधारी’ और ‘कामधारी’ रसूखदार कारोबारियों पर अब तक क्या ठोस कार्रवाई हुई है?
हादसा होने का इंतजार न करें!
हादसे के बाद जांच समितियां बनाना, मुआवजा घोषित करना और दो-चार दुकानों को सील कर देना भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था का पुराना ढांचा रहा है। लेकिन बारूद का कारोबार ‘गलती’ का दूसरा मौका नहीं देता।
सवाल सिर्फ यह नहीं है कि पटाखा किसकी दुकान से खरीदा गया, सवाल यह है कि अगर कल कोई अनहोनी हुई, तो उसकी आपराधिक और कानूनी जवाबदेही किसकी होगी—कागज वाले लाइसेंसधारी की, गद्दी वाले कारोबारी की, या आंखें मूंदकर बैठे जिम्मेदार तंत्र की?

