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रहनुमा’ या ‘कालदूत’? स्वास्थ्य व्यवस्था के समानांतर चल रही झोलाछाप सरकार!

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‘Leader’ or ‘Kaldoot’? A quack government running parallel to the health system!

जिला ब्यूरो फिलिप चाको :ग्रामीण भारत: देश में स्वास्थ्य सेवाओं के दावे चाहे जितने भी लंबे-चौड़े किए जाएं, लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां करती है। हालात यह हैं कि झोलाछाप डॉक्टरों (नकली हकीमों) की फौज अब सिर्फ गांवों की गलियों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने अपने मजबूत ‘संगठन’ भी खड़े कर लिए हैं। ऐसा लगता है कि मानो संगठन का कोई रजिस्ट्रेशन मिल गया हो और इसके साथ ही इलाज करने का खुला लाइसेंस भी जेब में आ गया हो!

 

*अब गांवों में साइकिल पंचर से ज्यादा मेडिकल स्टोर!*

 

इन ज्ञान के पुंजों और ‘ज्ञानदाताओं’ ने अब एक नया और अचूक नुस्खा निकाल लिया है—मेडिकल स्टोर संचालन का! जिस ग्रामीण भारत में कभी बड़ी मुश्किल से साइकिल सुधारने की एक अदद पंचर की दुकान मिलती थी, आज वहां गली-गली में अंग्रेजी दवाओं की ऐसी दुकानें खुल गई हैं जैसे मेडिकल स्टोर नहीं बल्कि परचून(किराने) की कोई दुकान चल रही हो।

यह नजारा देखकर अब गंभीर शंका होने लगी है कि क्या फार्मासिस्ट की डिग्री भी अब खुलेआम बाजार में बिकने लगी है? वरना क्या वजह है कि आज हर ऐरे-गैरे, नत्थू-खैरे के पास बाकायदा मेडिकल स्टोर भी है और उसकी आड़ में उनका अपना ‘प्राइवेट क्लिनिक’ भी धड़ल्ले से चल रहा है। इन झोलाछाप झोले-दवाखानों के आगे तो स्वास्थ्य विभाग का कद पूरी तरह बौना नजर आता है!

 

*5 साल की मेहनत बनाम ‘देखा-सिखी’ का ज्ञान*

 

एक तरफ वे छात्र हैं जो अपनी जवानी के 5 बहुमूल्य वर्ष, रातों की नींद और लाखों-करोड़ों रुपए खर्च कर एमबीबीएस या फार्मेसी की डिग्रियां हासिल करते हैं, और दूसरी तरफ वे ‘अनुभवी साहब’ हैं जिन्होंने चार दिन किसी दुकान पर सुई-सिरिंज चलाना सीख लिया और खुद को मसीहा घोषित कर दिया। विडंबना देखिए कि असली डिग्री वाले ‘नालायक’ साबित हो रहे हैं और देखकर सीखने वाले झोलाछाप साक्षात ‘डॉक्टर साहब’ बनकर अपनी मनमानी चिकित्सा पद्धति चला रहे हैं।

 

*कभी स्वर्गदूत, तो कभी सीधे ‘कालदूत’*

 

दूर-दराज के इलाकों में जहां सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं या तो भगवान भरोसे हैं या कोसों दूर, वहां ये झोलाछाप कई बार मजबूरी में ‘स्वर्गदूत’ बन जाते हैं। लेकिन बहुतेरों के लिए ये सीधे ‘कालदूत’ साबित होते हैं, जिनका हिसाब-किताब सिर्फ यमराज के पास ही मिलता है! हैरानी इस बात पर है कि स्वास्थ्य विभाग के पास लाखों शिकायतें पहुंचने के बावजूद इन पर कोई आंच नहीं आती। या तो पूरा विभाग इनके रहमो-करम पर चल रहा है, या फिर… खैर, इस पर पर्दा डालना ही बेहतर है!

 

*हर घर पर पैठ और राजनीतिक भविष्य की आहट*

 

इनकी लोकप्रियता और पकड़ का दायरा इतना व्यापक हो चुका है कि इन्हें हर ग्रामीण की बीमारी के साथ-साथ उसकी आर्थिक स्थिति का भी पूरा ‘संज्ञान’ रहता है। गरीबों के रहनुमा बनने की यह कला इन्हें आसमान के तारों की तरह दिन-प्रतिदिन बढ़ा रही है। इनकी बढ़ती तादाद को देखकर लगता है कि वो दिन दूर नहीं जब ये अपनी अलग ‘झोलाछाप पार्टी’ ही खड़ी कर लें और देश की संसद में स्टेथेस्कोप लटकाए नजर आएं।

राजनीति में झाड़ू, झोला और तमाम चीज़ें तो पहले से ही मौजूद हैं, अब भला स्टेथेस्कोप पीछे क्यों रहे?

 

*क्या वक्त रहते होगी ‘नसबंदी’?*

 

यदि समय रहते स्वास्थ्य प्रशासन और सरकार ने इस अवैध नेटवर्क और गली-कुचे के मेडिकल स्टोरों की आड़ में चल रहे इन झोलाछाप क्लिनिकों की ‘नसबंदी’ (रोकथाम) नहीं की, तो वह दिन दूर नहीं जब देश की कैबिनेट में मंत्रियों के साथ-साथ ‘झोलाछाप सलाहकारों’ का एक अलग मंत्रिमंडल ही बिठाना पड़ जाएगा! जनता त्रस्त है, विभाग बौना और मस्त है, और झोलाछाप अपनी धुन में मस्त हैं—वाह रे स्वास्थ्य व्यवस्था!

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