नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस विक्रम नाथ ने कानूनी क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के बढ़ते प्रभाव के संदर्भ में कहा कि तकनीक कानूनी कार्यों को सरल बना सकती है और समय बचा सकती है, लेकिन यह कभी भी एक वकील के प्रशिक्षित मस्तिष्क या जज के अनुशासित निर्णय की जगह नहीं ले सकती।
एआई उपकरण न कि विकल्प
हैदराबाद में एक सम्मेलन को संबोधित करते हुए जस्टिस नाथ ने आगाह किया कि एआई का उपयोग ‘उपकरण’ के रूप में होना चाहिए न कि ‘विकल्प’ के रूप में। उन्होंने कहा, ”तकनीक नोट ड्राफ्ट करने में मदद कर सकती है, लेकिन इसे कानून का आविष्कार करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”
उन्होंने हाल के उन उदाहरणों पर चिंता जताई जहां अदालतों में एआई द्वारा निर्मित फर्जी केस साइटेशन (संदर्भ) पेश किए गए। उन्होंने जोर देकर कहा कि ऐसी गलतियां केवल तकनीकी चूक नहीं हैं, बल्कि ये न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता और शुचिता पर सीधा प्रहार हैं।
एआई तकनीकी पारदर्शिता
भविष्य की राह बताते हुए जस्टिस नाथ ने ‘सिद्धांतवादी अनुकूलन’ का सुझाव दिया। उनके अनुसार, ”हमें तकनीक को केवल इसलिए नहीं ठुकराना चाहिए क्योंकि वह नई है, और न ही केवल इसलिए आंख मूंदकर अपनाना चाहिए क्योंकि वह कुशल है।” उन्होंने चेतावनी दी कि जहां तकनीक पारदर्शिता बढ़ा सकती है, वहीं यह नए प्रकार के अपराधों को भी जन्म दे सकती है। अंतत:, कानून का शासन उपकरणों की आधुनिकता पर नहीं, बल्कि संस्थानों की ईमानदारी और मानवीय विवेक पर निर्भर करता है।

