किरीट ठक्कर/ गरियाबंद। छत्तीसगढ़ शासन की प्रमुख योजना मुख्यमंत्री सुपोषण अभियान के क्रियांवन्यन और मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी महिला एवं बाल विकास विभाग पर है , किन्तु विभाग में ही अधिकारियों कर्मचारियों का टोटा है। आलम ये है कि जिले के मैनपुर ब्लॉक में पिछले एक वर्ष सहायक संचालक कृषि अधिकारी , महिला बाल विकास परियोजना अधिकारी का भी दायित्व सम्हाल रहे हैं। मैनपुर परियोजना कार्यालय में लिपिक तक नहीं है , 9 सेक्टरों में केवल 4 पर्यवेक्षक पदस्थ है बाकी की 5 पोस्ट खाली है। एक जानकारी के अनुसार मैनपुर विकासखंड में कुल 323 आंगनबाड़ी संचालित है जिनमें 297 मुख्य तथा 26 मिनी आंगनबाड़ी है। धवलपुर से गोहरा पदर तक फैले मैनपुर ब्लाक के विस्तृत क्षेत्र में एक – एक सेक्टर सुपरवाइजर पर 60 से अधिक आंगनबाड़ियों की मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी आती है , ऐसे में मॉनिटरिंग किस प्रकार होती होगी ,ये विचारणीय है। ठीक ऐसा ही हाल देवभोग ब्लॉक का भी है जहाँ सन 2016 के बाद से अब तक महिला बाल विकास परियोजना कार्यालय में सीडीपीओ की नियुक्ति नही हुई है। वर्तमान में प्रभार एसडीएम के पास है।देवभोग में 317 आंगनबाड़ी केंद्र संचालित है जिनमें 9 मिनी आंगनबाड़ी केंद्र है।
तीन पदों पर एक अधिकारी
मैनपुर ब्लॉक में पिछले एक वर्ष से भी अधिक समय से सहायक संचालक कृषि एन एस ध्रुव कृषि अधिकारी के साथ साथ जनपद पंचायत मैनपुर के सीईओ साथ ही महिला बाल विकास के परियोजना अधिकारी का प्रभार भी देख रहे हैं , इस तरह एक ही अधिकारी तीन तीन दायित्वों का निर्वहन किस तरह कर पाते होंगे समझा जा सकता है। बताया जाता है कि मैनपुर परियोजना कार्यालय में लिपिक तक नहीं है। केवल 4 सुपरवाइजरों के भरोसे 9 सेक्टर में 323 आंगनबाड़ी संचालित है। एक जानकारी ये भी मिली है कि जिस जिले के पांच ब्लॉकों में पांच सीडीपीओ पदस्थ रहना चाहिए ,वहां पिछले कई वर्षों से सिर्फ एक या दो चाइल्ड डेव्हलपमेंट प्रोजेक्ट ऑफिसर के सहारे काम चल रहा है। फिंगेश्वर में अभी कुछ माह पहले ही सीडीपीओ की नियुक्ति की गई है।
14 सितंबर से आंगनबाडी प्रारम्भ है
कोरोना काल में एक लंबे अर्से तक आंगनबाड़ियों का संचालन बंद कर दिया गया था , इस दौरान बच्चों को सुखा राशन वितरित किया जाता रहा , 14 सितंबर 2020 से जिले में आंगनबाड़ियों का संचालन पुनः प्रारम्भ किया गया है जहाँ बच्चों को गरम भोजन , रेडी टू इट वितरण की योजना संचालित है।
मुख्यमंत्री अमृत योजना फ्लॉप
वर्ष 2016 में भाजपा शासन के दौरान कुपोषित बच्चों को फ्लेवर्ड देवभोग दूध वितरण की योजना का प्रारम्भ गरियाबंद जिले से ही पॉयलेट प्रोजेक्ट के तहत किया गया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ रमनसिंह द्वारा जिला मुख्यालय के निकट ग्राम कसेरू में इस योजना की शुरुवात की गई थी , योजना के अनुसार सप्ताह में एक या दो दिन बच्चों को सुंगधित देवभोग दुध 100 एमएल के टेट्रापैक में वितरित किया जाना था किंतु योजना कुछ समय तक ही चल पायी।
नवाजतन योजना भी लगभग बंद
बीजेपी शासन के दौरान ही प्रारम्भ कि गई नवाजतन योजना वर्तमान में लगभग बंद पड़ी हुई है ,क्योंकि की इस योजना के तहत शासन से राशि ही प्राप्त नही हो रही है। इस योजना के तहत गंभीर कुपोषित बच्चों को सामाजिक संस्थाओं ,महिला समूहों साथ ही एनजीओ द्वारा गोद लेकर उनके कुपोषण दूर करने के प्रयत्न किये जाते थे , योजना के लिए बच्चों का चयन वजन के आधार पर किया जाता था ,पिछले लगभग दो वर्षों से इस योजना के लिए राशि जारी नही कि जा रही।
इस सबके बाद भी दावा है कि जिले में कुपोषण का प्रतिशत कम हुआ है ,पांच वर्ष पहले जिले में कुपोषण की दर 32 प्रतिशत थी, वर्तमान में मिली जानकारी के अनुसार अब केवल 14 प्रतिशत है।
जिला कार्यक्रम अधिकारी जगरानी एक्का के अनुसार विभाग में अधिकारियों कर्मचारियो की कमी तो है किंतु जिला प्रशासन के सहयोग से हम सभी योजनाओं की मॉनीटिरिंग तथा क्रियांवन्यन कर पा रहे हैं। समय समय पर जिला प्रशासन की ओर से अन्य विभागों के अधिकारियों कर्मचारियों को क्षेत्रानुसार नोडल अधिकारी नियुक्त किया जाता है ताकि महिला बाल विकास विभाग की योजनाओं का सही ढंग से क्रियान्वयन हो पाए साथ लक्ष्य प्राप्ति के भी पूरे प्रयास किये जा सकें।
विदित हो कि 2019 में राज्य सरकार द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में 35.60 प्रतिशत छोटे बच्चे कुपोषण से तथा 41.50 प्रतिशत महिलायें एनीमिया से पीड़ित हैं। कुपोषण तथा एनीमिया के प्रकोप से इतने अधिक लोगों का पीड़ित होना , राज्य की भावी पीढ़ी के स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित करता है। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल द्वारा इस स्थिति को देखते हुए 2 अक्टूबर 2019 से ‘ कुपोषण मुक्ति अभियान , आरम्भ किया और राज्य में कुपोषण तथा एनीमिया को जड़ से समाप्त करने का संकल्प लिया है।

