BREAKING CG NEWS

स्टेथोस्कोप से इलाज या टिकट का जुगाड़? बालोद के ‘चिकित्सक सम्मेलन’ में थर्मामीटर से ज्यादा राजनीतिक पारा हाई!

Share this

Treatment with a stethoscope or a ticket arranging? The political temperature is higher than the thermometer at the ‘doctors’ conference in Balod!

बालोद जिला ब्यूरो फिलिप चाको की रिपोर्ट : जनाब, स्वास्थ्य ही धन है—यह तो आपने सुना होगा, लेकिन बालोद के टाउन हॉल में जो नजारा दिखा, उससे ऐसा लगा कि मानो अब स्वास्थ्य सेवाओं के रास्ते सीधे विधानसभा की सीढ़ियां चढ़ने लगी हैं! निजी चिकित्सक कल्याण संघ के बैनर तले आयोजित ‘जिला स्तरीय चिकित्सक सम्मेलन एवं सम्मान समारोह’ का मूल उद्देश्य तो भले ही मरीजों की नब्ज टटोलना रहा हो, लेकिन वहां जो सियासी नुस्खे बांटे गए, उन्हें देख कर तो अच्छे-अच्छे वैद्य भी चकरा जाएं।

आइए, इस मेडिकल-कम-पॉलिटिकल ड्रामा की थोड़ी ‘विस्तृत जांच’ (Diagnostics) करते हैं!

1. थर्मामीटर से नापें या वोटों से? मंच पर मरीज़ कम, विधायक के दावेदार ज़्यादा!

भाई वाह! सम्मेलन था डॉक्टरों का, लेकिन चर्चा छिड़ गई चुनावी टिकटों की। कार्यक्रम में जब रायपुर विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष (राज्यमंत्री) साहब ने माइक थामा, तो उन्होंने सीधे मेडिकल साइंस को दरकिनार करते हुए ‘राजनीतिक सर्जरी’ शुरू कर दी।

* नेताजी का नुस्खा: मंच से ऐलान हो गया कि बालोद में बहुत दिन से भाजपा का विधायक नहीं बना है, तो इस बार यहीं बैठे किसी ‘योग्य उम्मीदवार’ को टिकट दिलाकर ही मानेंगे!

* नतीजा: अब डॉक्टर सोच में हैं कि वे मरीजों की पर्ची पर दवा लिखें या पार्टी की सदस्यता रसीद काटें। भला हो इस सम्मेलन का, जहां इलाज के साथ-साथ ‘विधायक बनाने की गारंटी’ का फ्री पैकेज भी मिल रहा है!

2. पूर्व विधायक का अनोखा तर्क— “बड़े अस्पताल लूटते हैं, हमारे वाले डॉक्टर ही बेड़ा पार लगाते हैं!”

कार्यक्रम में पूर्व विधायक महोदय ने निजी चिकित्सकों की तारीफ करते-करते ऐसा सियासी टॉनिक पिलाया कि जनता भी सोच में पड़ गई। उन्होंने फरमाया कि बड़े अस्पताल तो मरीजों की जेब काटते हैं, असली मसीहा तो हमारे स्थानीय निजी चिकित्सक हैं जो कम खर्च में इलाज कर देते हैं।

* बात बिल्कुल सही है भई, जब झोलाछाप या बिना डिग्री वाले भी ‘होम डिलीवरी सर्विस’ यानी घर जाकर ग्लूकोज चढ़ाने लगें, तो बड़े-बड़े सुपर-स्पेशलिटी अस्पतालों को ताला ही लगाना पड़ेगा! बस फर्क इतना है कि बड़े अस्पताल वाले बिल थमाते हैं, और ये ‘मसीहा’ सीधे भगवान के पास भेजने का शॉर्टकट दे देते हैं।

3. नेताजी का ज्ञान: “दुकान में नशीली दवाएं नहीं रखीं, हमने तो सिर्फ…”

भाजपा जिला अध्यक्ष महोदय ने भी कम योगदान नहीं दिया। उन्होंने निजी चिकित्सकों को समाज का ‘इन्फ्लुएंसर’ बताते हुए सलाह दी कि वे चिकित्सा की आड़ में गलत काम न करें। उन्होंने अपनी मिसाल देते हुए बताया कि भई, जब हम दुकान चलाते थे तो कभी नशीली दवाएं नहीं बेचीं!

* अब जनता पूछे कि भई, यह ज्ञान ‘चिकित्सक सम्मेलन’ में क्यों दिया जा रहा है? क्या डॉक्टर लोग पैरासिटामोल की जगह कफ सिरप का ‘रॉकस्टार’ वर्जन बांटने की ट्रेनिंग लेने आए थे?

क्या वाकई मरीजों का हित या सिर्फ सियासी हित?

इस पूरे सम्मेलन के बाद बालोद के स्वास्थ्य गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है—

* क्या यह सम्मेलन डॉक्टरों की समस्याओं सुनने के लिए था या आगामी चुनाव के लिए ‘ग्राउंड तैयार’ करने का कोई गुप्त प्रोजेक्ट था?

* एक तरफ संगठन के भीतर ही सुगबुगाहट और नाराजगी की खबरें हैं कि मंच पर डॉक्टर कम और पार्टी के झंडे-डंडे ज्यादा चमक रहे थे, तो दूसरी तरफ नेताजी लोग अपनी सियासी रोटियां सेंकने में व्यस्त हैं।

निष्कर्ष: मरीज जाए तो जाए कहां?

अरे जनाब! नियम-कानून, नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC), डिग्री, पंजीयन तो कागजी बातें हैं। असली कानून तो अब मंच से तय होगा कि किस डॉक्टर को कौन सा चुनावी चोला पहनना है।

अतः सलाह यही है कि अगली बार जब किसी ‘चिकित्सक सम्मेलन’ में जाएं, तो जेब में स्टेथोस्कोप के साथ-साथ एक राजनीतिक पार्टी का सदस्यता फॉर्म जरूर रख लें—क्या पता, अगली बार पर्ची पर बीमारी का नहीं, बल्कि विधानसभा क्षेत्र का नाम लिखा मिले!

Share this

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *