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चाय पर चर्चा: चक्का जाम किसके खिलाफ सरकार के खिलाफ या आम जनता के खिलाफ

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Chai Par Charcha : Chakka Jam against whom against the government or against the general public

कवर्धा में किसान संघ के चक्का जाम ने आज सड़कों पर ऐसी तस्वीर दिखाई कि चाय की टपरी से लेकर शहर की गलियों तक एक ही सवाल गूंजता नजर आया आंदोलन सरकार के खिलाफ है या आम जनता के खिलाफ

किसानों की मांगें अपनी जगह हैं, सरकार के खिलाफ आंदोलन करना लोकतांत्रिक अधिकार है और अपनी बात रखने का भी पूरा हक है। लेकिन सवाल तब खड़ा होता है, जब आंदोलन की तपिश में वह आम आदमी झुलसने लगे, जिसका इस पूरे विवाद से कोई लेना-देना ही नहीं है।

आज कवर्धा शहर और आसपास के करीब 10 किलोमीटर क्षेत्र के लोगों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ा। जो लोग गांव से अपने जरूरी काम से कवर्धा आए थे, जो नौकरी पर गए थे, अस्पताल जा रहे थे, रिश्तेदारों को लेने-छोड़ने जा रहे थे या रोजमर्रा के काम से शहर आना-जाना कर रहे थे कई लोगों को रास्ते में रोक दिए जाने की शिकायत सामने आई।

सबसे बड़ा सवाल यह कि क्या हर दोपहिया वाहन किसान विरोधी है क्या हर लोकल वाहन सरकार का समर्थक है

अगर कोई CG-09 की गाड़ी है, उसमें कवर्धा का कोई स्थानीय व्यक्ति बैठा है, कोई कर्मचारी अपनी ड्यूटी पर जा रहा है, कोई शिक्षक स्कूल जा रहा है, कोई अस्पताल कर्मचारी ड्यूटी पर जा रहा है या कोई व्यक्ति अपने परिजन को अस्पताल लेकर जा रहा है तो आखिर उसकी गलती क्या है

ट्रक रोकिए, लेकिन मरीज को क्यों

चक्का जाम का उद्देश्य अगर सरकार तक अपनी आवाज पहुंचाना है, तो बड़े ट्रक, भारी वाहन और मालवाहक वाहनों को रोककर सरकार को संदेश देना समझ में आता है।

लेकिन जब दोपहिया वाहन, स्थानीय गाड़ियां और जरूरी काम से आने-जाने वाले लोगों को भी रोक दिया जाए, तब सवाल उठना स्वाभाविक है कि आंदोलन का निशाना आखिर कौन है?

किसी को अस्पताल जाना हो, किसी को नौकरी पर पहुंचना हो, किसी को परीक्षा देनी हो या किसी को अपने परिवार के पास पहुंचना हो—आम आदमी सड़क पर खड़ा होकर आंदोलन का नुकसान क्यों भुगते

किसान अन्नदाता हैं। उनकी समस्याओं को सरकार को गंभीरता से सुनना चाहिए। लेकिन उसी अन्नदाता के आंदोलन में अगर आम जनता ही परेशान होकर यह पूछने लगे कि “हमने क्या गलती की है, तो आंदोलन के तरीके पर विचार करना भी जरूरी हो जाता है।

सरकार के खिलाफ नाराजगी है तो सरकार से सवाल कीजिए। प्रशासन से जवाब मांगिए। ज्ञापन दीजिए। धरना दीजिए। बड़े वाहनों को रोककर विरोध दर्ज कराइए।

लेकिन स्थानीय नागरिकों के आवागमन को पूरी तरह बंद कर देना क्या उचित है

कवर्धा शहर से जुड़े लोग, आसपास के गांवों के लोग, कर्मचारी, शिक्षक, अस्पताल का स्टाफ और जरूरी काम से आने-जाने वाले नागरिक इनके लिए कम से कम रास्ता तो खुला रहना चाहिए।

आंदोलन मजबूत हो लेकिन जनता कमजोर क्यों

आंदोलन की ताकत उसकी भीड़ में नहीं, बल्कि उसकी मांग और उसके तरीके की स्वीकार्यता में होती है।

किसानों की मांग जायज है या नहीं, इसका फैसला सरकार और संबंधित पक्ष करेंगे। लेकिन आम जनता को परेशान करके किसी आंदोलन की मांग कितनी मजबूत होगी, यह सोचने का विषय जरूर है।

आज कवर्धा में कई लोगों के चेहरे पर गुस्सा कम और बेबसी ज्यादा दिखाई दी।

किसी ने कहा हमें ऑफिस जाना है।

किसी ने कहा घर जाना है।

किसी ने कहा अस्पताल जाना है।

और किसी का सवाल था हमने क्या किया है

यही सवाल आज चाय की टपरी से लेकर शहर के चौराहों तक चर्चा का विषय बना हुआ है।

चाय पर चर्चा का सवाल सीधा है

चक्का जाम सरकार को जगाने के लिए है या आम जनता को रोकने के लिए

किसान आंदोलन करे, सरकार से लड़े, अपनी मांग मनवाए लेकिन लोकतांत्रिक आंदोलन में आम जनता की परेशानी कम से कम हो, इसका ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है।

क्योंकि सरकार के खिलाफ लड़ाई में जनता को ही बंधक बना लेना इस पर किसान नेतृत्व को भी गंभीरता से सोचना चाहिए

पत्रकार दीपक तिवारी

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