Tribals on paper, but who holds possession of the land?
दल्लीराजहरा। कुसुमकसा में स्टेट हाईवे के किनारे जमीन का खेल अब सिर्फ खसरा नंबर और रकबे तक सीमित दिखाई नहीं दे रहा है। मामला उस सवाल तक पहुंच गया है जिसे अक्सर कागजों की मोटी फाइलों के बीच दबा दिया जाता है—जमीन आखिर किसकी है, किसके नाम है और फायदा किसे मिल रहा है?
कुसुमकसा के खसरा क्रमांक 787/8, रकबा 0.0500 हेक्टेयर को लेकर कथित खरीद-बिक्री और प्लाटिंग के आरोपों के बीच अब शासन के ताजा दिशा-निर्देशों ने प्रशासनिक जांच को एक नया आईना दिखा दिया है। निर्देशों में आदिवासी भूमि के केवल प्रत्यक्ष हस्तांतरण ही नहीं, बल्कि ऐसे अप्रत्यक्ष हस्तांतरण की भी जांच पर जोर दिया गया है, जहां जमीन कागज पर किसी और के नाम हो और उसका वास्तविक कब्जा या आर्थिक लाभ किसी दूसरे व्यक्ति के पास होने की आशंका हो।
यानी अब सवाल सिर्फ यह नहीं रहेगा कि रजिस्ट्री किसके नाम हुई?
सवाल यह भी होगा कि जमीन पर असली नियंत्रण किसका है और जमीन से कमाई किसकी हो रही है?
प्लाटिंग पर रोक, लेकिन सवालों की प्लॉटिंग जारी
कुसुमकसा के इस मामले में पूर्व में शिकायत सामने आने के बाद अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) सुरेश साहू द्वारा उच्चस्तरीय जांच के निर्देश दिए जाने तथा कथित प्लाटिंग गतिविधि पर रोक संबंधी कार्रवाई की जानकारी सामने आई थी। पंजीयन स्तर पर भी आवश्यक कार्रवाई के निर्देश दिए जाने की बात कही गई है।
लेकिन मजेदार बात यह है कि जमीन पर प्लाटिंग रुकी या नहीं, यह तो जांच बताएगी; मगर सवालों की प्लाटिंग लगातार बढ़ती जा रही है।
अब शासन के नए निर्देशों के बाद जांच का दायरा भी बढ़ता दिखाई दे रहा है।
अब सिर्फ रजिस्ट्री नहीं, ‘रियल कंट्रोल’ भी जांच के घेरे में
शासन के दिशा-निर्देशों के मुताबिक ऐसे मामलों की जांच महत्वपूर्ण है, जहां आदिवासी भूमि किसी गैर-आदिवासी के सीधे नाम पर न होकर किसी परिचित, रिश्तेदार, कर्मचारी या अन्य व्यक्ति के नाम पर खरीदी गई हो, लेकिन भूमि का वास्तविक उपयोग, कब्जा अथवा आर्थिक लाभ किसी अन्य व्यक्ति के पास होने की आशंका हो।
यानी अब “नाम किसका है?” के साथ-साथ “नियंत्रण किसका है?” भी महत्वपूर्ण सवाल बन गया है।
कुसुमकसा के खसरा 787/8 में भी जांच के दौरान यह देखना अहम होगा कि मूल खातेदार कौन था, भूमि किसके पक्ष में और किन परिस्थितियों में हस्तांतरित हुई, दस्तावेजों में क्या उल्लेख है, भूमि उपयोग में क्या परिवर्तन हुआ, प्लाटिंग के लिए आवश्यक अनुमति ली गई या नहीं और प्रस्तावित प्लाटों का वास्तविक नियंत्रण किसके पास है।
0.0500 हेक्टेयर जमीन, लेकिन सवाल कई बीघे के!
रकबा भले ही 0.0500 हेक्टेयर हो, लेकिन इस छोटे से भूखंड ने सवालों का दायरा काफी बड़ा कर दिया है।
क्या जमीन का हस्तांतरण नियमानुसार हुआ?
क्या भूमि का उपयोग उसी उद्देश्य के लिए हो रहा है जिसके लिए अनुमति मिली?
क्या प्लाटिंग के लिए सभी वैधानिक प्रक्रियाएं पूरी की गईं?
और सबसे अहम—क्या कागज और जमीन की वास्तविक स्थिति एक जैसी है?
इन सवालों के जवाब जांच रिपोर्ट में तलाशे जाने हैं।
शासन का संदेश—नाम बदलने से नियम नहीं बदलेंगे
आदिवासी भूमि से जुड़े मामलों में छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता के विशेष प्रावधान लागू होते हैं। धारा 165(6) और 170-बी से जुड़े प्रावधानों में आदिवासी भूमि के हस्तांतरण तथा नियम-विरुद्ध हस्तांतरण की स्थिति में कार्रवाई और भूमि वापसी से संबंधित व्यवस्थाएं हैं।
शासन के ताजा दिशा-निर्देशों का व्यापक उद्देश्य भी यही है कि यदि किसी मामले में भूमि का वास्तविक नियंत्रण और आर्थिक लाभ कागज पर दर्ज व्यक्ति से अलग पाया जाता है तो उस पहलू को भी जांच से बाहर न रखा जाए।
अर्थात अब “कागज पर सब ठीक है” कह देना शायद पर्याप्त नहीं होगा।
डॉ. देवेंद्र माहला—आदिवासी जमीन की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता
भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा के प्रदेश महामंत्री एवं अखिल भारतीय हल्बा-हल्बी आदिवासी समाज के केंद्रीय अध्यक्ष डॉ. देवेंद्र माहला ने आदिवासी परिवारों की जमीन से जुड़े मामलों पर चिंता जताई।
उन्होंने कहा कि यदि कहीं आदिवासी किसानों को गुमराह कर कम कीमत में जमीन खरीदने, बाद में महंगे दाम पर प्लाट काटकर बेचने अथवा नियमों को दरकिनार कर भूमि हस्तांतरण की शिकायत सामने आती है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
डॉ. माहला ने कहा कि शासन द्वारा आदिवासी भूमि के संदिग्ध प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष हस्तांतरण को लेकर जारी दिशा-निर्देश महत्वपूर्ण हैं। यदि जांच में किसी व्यक्ति अथवा अधिकारी-कर्मचारी की भूमिका नियम-विरुद्ध पाई जाती है तो नियमानुसार कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने आवश्यकता पड़ने पर ऐसे मामलों को मुख्यमंत्री, राजस्व मंत्री सहित संबंधित स्तर पर उठाने की बात कही।
मंजू बैस—समय रहते रोकना जरूरी
जनपद पंचायत सभापति, महिला एवं बाल विकास मंजू बैस ने भी क्षेत्र में जमीन संबंधी अनियमितताओं की जानकारी मिलने की बात कहते हुए प्रशासन से गंभीरता से जांच की मांग की।
उन्होंने कहा कि यदि किसी आदिवासी किसान को भ्रमित कर जमीन का सौदा कराया जा रहा है अथवा नियमों के विपरीत प्लाटिंग की जा रही है तो समय रहते रोक लगाना जरूरी है। उन्होंने प्रशासन के समक्ष विषय रखने और दोषी पाए जाने वालों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग करने की बात कही।
अब असली कहानी जांच रिपोर्ट लिखेगी
फिलहाल कुसुमकसा के खसरा क्रमांक 787/8, रकबा 0.0500 हेक्टेयर को लेकर प्रशासनिक जांच आगे बढ़ रही है। शासन के नए निर्देशों के बाद अब जांच केवल कथित प्लाटिंग तक सीमित रहने के बजाय भूमि के मूल खातेदार, हस्तांतरण की परिस्थितियां, दस्तावेज, कब्जा, वास्तविक उपयोग, आर्थिक लाभ, भूमि उपयोग परिवर्तन, प्लाटिंग की अनुमति तथा राजस्व-पंजीयन प्रक्रिया जैसे पहलुओं तक पहुंच सकती है।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—
कागज पर जमीन किसकी है, यह दस्तावेज बताएंगे।
लेकिन जमीन पर असली नियंत्रण किसका है और लाभ किसे मिल रहा है, इसका जवाब जांच देगी।
फिलहाल किसी व्यक्ति या अधिकारी को दोषी ठहराना जल्दबाजी होगी। दोष सिद्ध होना जांच का विषय है। लेकिन शासन के नए निर्देशों ने इतना जरूर स्पष्ट कर दिया है कि आदिवासी भूमि के मामलों में अब केवल कागजी खानापूर्ति नहीं, बल्कि कागज से लेकर कब्जे और लाभार्थी तक की पूरी कहानी जांच के दायरे में आ सकती है।
और यदि सब कुछ नियम के मुताबिक है तो जांच रिपोर्ट सबसे साफ जवाब देगी—
“जमीन भी सही, कागज भी सही और कहानी भी सही।”
लेकिन यदि कागज कुछ और और जमीन की कहानी कुछ और निकली, तो फिर 787/8 का खसरा नंबर सिर्फ एक भूखंड का नंबर नहीं, बल्कि कई सवालों का पता बन सकता है।

