चाय पर चर्चा: चाय पर चर्चा में इन दिनों मरका सहकारी समिति के प्रबंधक को लेकर चर्चाएं तेज हैं। सवाल यह है कि जिस प्रबंधक की मासिक आय करीब ₹28 हजार बताई जा रही है उसके पास करोड़ों की संपत्ति होने की चर्चा आखिर कैसे सामने आ रही है
बताया जा रहा है कि प्रबंधक द्वारा मुख्य मार्ग पर करीब 5 एकड़ जमीन खरीदे जाने की बात कही जा रही है और कवर्धा में मकान सहित अन्य संपत्तियों को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। ऐसे में आम आदमी का सीधा सवाल है—इतनी बड़ी संपत्ति का स्रोत क्या है और इसकी आय-व्यय का हिसाब क्या कहता है
हर साल धान खरीदी के सीजन में सहकारी समितियों में करोड़ों रुपये के लेन-देन होते हैं। मरका समिति में भी धान खरीदी और उससे जुड़े कार्यों को लेकर यदि लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं, तो केवल शिकायतों को फाइलों में दबाकर रखने के बजाय निष्पक्ष जांच क्यों नहीं कराई जाती
सबसे बड़ा सवाल तो यह है कि यदि प्रबंधक के खिलाफ बार-बार शिकायतें की गई हैं, तो संबंधित सरकारी विभाग अब तक क्या जांच कर चुका है? शिकायत सही है तो कार्रवाई होनी चाहिए और शिकायत गलत है तो जांच के बाद प्रबंधक को भी क्लीन चिट मिलनी चाहिए। लेकिन न जांच, न जवाब और न कार्रवाई—यह व्यवस्था पर ही सवाल खड़ा करता है।
चाय की दुकान पर बैठा आम आदमी पूछ रहा है—₹28 हजार की कमाई में करोड़ों की संपत्ति की चर्चा आखिर कैसे? क्या संपत्ति की जांच होगी क्या आय के स्रोतों का सत्यापन होगा? क्या धान खरीदी से जुड़े रिकॉर्ड और वर्षों के लेन-देन की ऑडिट होगी
अब जरूरत आरोप लगाने की नहीं, बल्कि दस्तावेजों के आधार पर निष्पक्ष जांच की है। यदि संपत्ति वैध है तो सच सामने आना चाहिए और यदि आय से अधिक संपत्ति या धान खरीदी में अनियमितता मिली तो जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए।
चाय पर चर्चा का सवाल साफ है—सहकारी समिति आखिर किसके लिए है, किसानों के लिए या कुछ लोगों की संपत्ति बढ़ाने के लिए है
पत्रकार दीपक तिवारी

