One teacher… five classes… 40 innocent children! It seems the Education Department has discovered the Indian version of ‘Superwoman’.
जिला ब्यूरो फिलिप चाको | बालोद : बालोद के गंजपारा स्थित शासकीय प्राथमिक विद्यालय की तस्वीर देखकर ऐसा लगता है कि शिक्षा विभाग अब नई शिक्षा नीति नहीं, बल्कि “एक शिक्षक–संपूर्ण विद्यालय योजना” पर प्रयोग कर रहा है।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार यहां पहली से पांचवीं तक की करीब 40 बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा केवल एक शिक्षिका के कंधों पर है। अब यह समझ से परे है कि शिक्षिका पहले पहली कक्षा को ‘अ’ से अनार पढ़ाएं, दूसरी को जोड़-घटाना सिखाएं, तीसरी को पर्यावरण समझाएं, चौथी को हिंदी का व्याकरण पढ़ाएं या पांचवीं को गणित के सवाल हल कराएं? यदि यह सब एक साथ संभव है, तो फिर शायद न्यूटन और आइंस्टीन को भी शिक्षा विभाग से प्रशिक्षण लेना चाहिए था।
शायद विभाग का मानना है कि सरकारी शिक्षकों में अब आठ नहीं, सोलह हाथ उग चुके हैं। तभी तो एक शिक्षिका से पांच कक्षाओं का संचालन कराने में किसी को कोई परेशानी नजर नहीं आती। आखिर बच्चों का भविष्य है, कोई प्राथमिकता थोड़े ही!
विडंबना देखिए… एक तरफ स्कूल शिक्षक के इंतजार में है, दूसरी तरफ जिले के कई शिक्षक विभिन्न कार्यालयों, विभागों और छात्रावासों में वर्षों से अटैचमेंट का सुख भोग रहे हैं। ऐसा लगता है कि बच्चों को पढ़ाने से ज्यादा जरूरी फाइलों की धूल झाड़ना और दफ्तरों की कुर्सियां संभालना हो गया है।
सरकार करोड़ों रुपये शिक्षा सुधार, स्मार्ट क्लास, डिजिटल इंडिया और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के दावे करती है, लेकिन जमीनी हकीकत पूछिए तो एक शिक्षिका पूरे स्कूल की ‘वन मैन आर्मी’ बनी हुई है। शायद विभाग को लगता होगा कि जब एक शिक्षिका से काम चल रहा है तो बाकी शिक्षकों की जरूरत ही क्या है?
प्रश्न यह भी है कि यदि अनावश्यक अटैचमेंट समाप्त करने के आदेश पहले ही जारी हो चुके हैं, तो फिर उनका पालन आखिर किस फाइल में बंद पड़ा है? या फिर आदेश केवल कागजों की शोभा बढ़ाने के लिए जारी किए जाते हैं?
सबसे बड़ा नुकसान उन मासूम बच्चों का हो रहा है, जिन्हें संविधान ने शिक्षा का अधिकार दिया है। लेकिन अधिकार और हकीकत के बीच की दूरी इतनी बढ़ चुकी है कि अब बच्चों को शिक्षक नहीं, व्यवस्था की बेरुखी पढ़ाई जा रही है।
अब देखना यह है कि शिक्षा विभाग इस खबर के बाद भी नींद से जागेगा या फिर हमेशा की तरह कोई नया बहाना ढूंढ़कर मामले को फाइलों में दफना देगा। क्योंकि सवाल सिर्फ एक स्कूल का नहीं, बल्कि उन मासूम बच्चों के भविष्य का है, जिनके सपनों पर सरकारी लापरवाही का पाठ पढ़ाया जा रहा है।

