बालोद। विकास के दावों की चमकदार फाइलों के बीच ग्राम नेवारीकला की हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। यहां जीना तो पहले से ही दुभर था, अब मौत के बाद की राह भी आसान नहीं बची। लगातार हो रही बारिश ने मुक्तिधाम तक जाने वाले रास्ते को ऐसा जलमग्न कर दिया है कि अंतिम यात्रा भी मानो किसी परीक्षा से कम नहीं रह गई है।
जिस रास्ते से श्रद्धांजलि और सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी जानी चाहिए, वहां आज ग्रामीणों को कमर तक पानी और कीचड़ से जूझते हुए शव लेकर गुजरना पड़ रहा है। ऐसा लगता है जैसे व्यवस्था ने जीवन के साथ-साथ मृत्यु के सम्मान का भी ठेका बारिश के भरोसे छोड़ दिया हो।
ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या नई नहीं है। हर वर्ष बरसात आते ही मुक्तिधाम का मार्ग तालाब में तब्दील हो जाता है, लेकिन जिम्मेदारों के कानों तक शायद पानी नहीं पहुंचता। चुनावी मौसम में विकास की लंबी-लंबी बातें करने वाले जनप्रतिनिधि और अधिकारी इस रास्ते की ओर शायद इसलिए नहीं देखते, क्योंकि यहां वोट नहीं, अंतिम यात्रा निकलती है।
विडंबना यह है कि सरकार “सम्मानजनक जीवन” की बातें करती है, लेकिन नेवारीकला में तो सम्मानजनक विदाई भी नसीब नहीं हो पा रही है। सवाल यह है कि क्या किसी बड़ी दुर्घटना या किसी वीआईपी की अंतिम यात्रा का इंतजार किया जा रहा है, तब जाकर इस रास्ते की सुध ली जाएगी?
ग्रामीणों ने प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से मांग की है कि मुक्तिधाम तक जाने वाले मार्ग का स्थायी समाधान कराया जाए, ताकि बारिश के मौसम में भी अंतिम संस्कार जैसी संवेदनशील प्रक्रिया सम्मान और सुरक्षा के साथ पूरी हो सके।
फिलहाल नेवारीकला की तस्वीर यही कह रही है— “जीना तो दुभर था ही, अब मौत के बाद की राह भी नहीं आसान।” विकास के दावों के बीच यह दृश्य व्यवस्था से एक सवाल पूछ रहा है— क्या इंसान को सम्मानजनक विदाई का अधिकार भी अब मौसम का मोहताज हो गया है?

