DAINIK CHHATTISGARH WATCH SPECIAL sideways glance: Madam’s meeting and the heartbeat of the honorables…
छत्तीसगढ़ में इन दिनों वीआईपी दौरों की ऐसी झड़ी लगी है कि अफसरों से लेकर नेताओं तक, सबकी दिनचर्या में हलचल मची हुई है। राष्ट्रपति और संघ प्रमुख मोहन भागवत के दौरे के बाद अब बीजेपी की प्रदेश प्रभारी स्मृति ईरानी की बारी है। मैडम रविवार से दो दिन तक लगातार बैठकें लेंगी। जाहिर है, राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म है और सबसे ज्यादा धुकधुकी मंत्रिमंडल में बताई जा रही है।
मंत्रियों को चिंता इस बात की है कि बैठक में कहीं कामकाज की समीक्षा करते-करते कुर्सी का हिसाब-किताब न शुरू हो जाए। चर्चा तो यहां तक है कि अगर मंत्रिमंडल में कोई फेरबदल होना है, तो उसके संकेत इन्हीं बैठकों से मिल सकते हैं। हालांकि, अभी यह सब कयासों के गलियारे में ही है।
स्मृति ईरानी की पहचान तेज-तर्रार नेता की रही है। लिहाजा, बैठक में कौन-सा सवाल किससे पूछ लिया जाए, इसका अंदाजा लगाना आसान नहीं। अब मंत्रीजी अपनी फाइलें दुरुस्त कर रहे हैं या जवाबों की रिहर्सल, यह तो वही जानें। फिलहाल आलम यह है कि बैठक की तारीख कैलेंडर में भले दर्ज हो, लेकिन कई माननीयों के दिलों में उसकी उलटी गिनती पहले से शुरू हो गई है।
कुर्सी पर बैठना तो सबको आता है, अब सवाल बस इतना है कि बैठक के बाद वही कुर्सी मिलेगी या उसका पता बदल जाएगा।
साड़ी, एके-47 और वायरल बवाल
दशहरे पर शस्त्र पूजा की परंपरा पुरानी है, लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ में कुछ पुलिस अधिकारियों की हर्ष फायरिंग ने परंपरा को सोशल मीडिया का नया कंटेंट बना दिया। अलग-अलग जिलों से आईपीएस अधिकारियों के फायरिंग करते वीडियो और तस्वीरें सामने आए। मगर सबसे ज्यादा चर्चा राजनांदगांव की एसपी अंकिता शर्मा की हुई।
साड़ी पहने एके-47 से दनादन फायरिंग करती उनकी तस्वीरें और वीडियो खूब वायरल हुए। सोशल मीडिया पर किसी ने अंदाज की तारीफ की, किसी ने उन्हें ‘लेडी सिंघम’ कहा, तो किसी ने ‘छत्तीसगढ़िया बेटी’ बताकर समर्थन जताया। लेकिन वायरल होने का एक दूसरा पहलू भी सामने आया।इस मामले में उन्हें नोटिस जारी हो गया।
अब सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं कि जब दूसरे जिलों के अधिकारियों की हर्ष फायरिंग के वीडियो भी सामने आए, तो कार्रवाई की चर्चा केवल अंकिता शर्मा के मामले में ही क्यों ज्यादा है? बहरहाल, इस सवाल का जवाब संबंधित विभाग ही बेहतर दे सकता है।
दशहरे पर शस्त्र पूजा का मकसद शस्त्रों का सम्मान है, लेकिन इस बार सोशल मीडिया ने पूजा से ज्यादा फायरिंग का हिसाब-किताब खोल दिया। कैमरे ने अपना काम किया, वीडियो वायरल हुआ और फिर नोटिस ने पूरी कहानी में नया मोड़ जोड़ दिया।
शस्त्र पूजा में निशाना बंदूक ने साधा था, लेकिन सुर्खियों का निशाना नोटिस पर जाकर लगा।
नायब तहसीलदार या नवाब तहसीलदार?
आजकल जन्मदिन मनाने के लिए केक, मोमबत्ती और दोस्तों की महफिल ही काफी नहीं रह गई है। कुछ लोगों को लगता है कि जब तक सड़क या कार में जन्मदिन का जश्न न हो, तब तक सेलिब्रेशन में वह बात कहां। खासकर अधिकारियों और उनके परिवारों के बीच इस अंदाज का शौक खूब चर्चा बटोर रहा है।
हाल ही में रायपुर के एक नायब तहसीलदार का कार में जन्मदिन मनाने वाला वीडियो वायरल हुआ। बस फिर क्या था। सोशल मीडिया के हुनरमंद लोगों ने पदनाम में ही बदलाव कर दिया। नायब तहसीलदार को लोग ‘नवाब तहसीलदार’ कहकर चुटकी लेने लगे।
वैसे भी, तहसील में कामकाज की फाइलें भले नियम-कायदों से चलती हों, लेकिन जन्मदिन का जश्न अपने हिसाब से चलता दिखा। कार में पार्टी का वीडियो लोगों के हाथ लगा तो बधाइयों से ज्यादा तंज की बरसात होने लगी।
अब साहब ने जन्मदिन मनाया, यह उनकी निजी खुशी थी, लेकिन वीडियो सार्वजनिक हुआ तो वह सार्वजनिक चर्चा का विषय बन गया। सोशल मीडिया का भी अजब हिसाब है। आप केक काटिए, लोग कैप्शन काटने लगते हैं।
केक पर मोमबत्तियां कम थीं या नहीं, पता नहीं, पर वीडियो ने पदनाम की एक अतिरिक्त ‘नवाबी’ जरूर जला दी।
टिकिट से पहले ही खींची तलवारें
नगरीय निकाय चुनाव की घोषणा अभी हुई नहीं है, लेकिन कांग्रेस में टिकट को लेकर दावेदारी और गुटबाजी का खेल शुरू हो गया है। भिलाई में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल और देवेंद्र यादव के खेमे आमने-सामने हैं। भूपेश समर्थक चाहते हैं कि भिलाई, भिलाई-चरौदा और रिसाली तीनों निगमों में उनकी पसंद चले। लेकिन भिलाई में देवेंद्र यादव और रिसाली में पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू भी अपना प्रभाव छोड़ने को तैयार नहीं हैं।
टिकट की आस में दावेदारों की भीड़ पूर्व मुख्यमंत्री के निवास पर जुट रही है। अब देखना यह है कि टिकट की इस दौड़ में किसकी पसंद को कितनी तवज्जो मिलती है। फिलहाल, भूपेश और देवेंद्र के बीच आमना-सामना टालने की चर्चा है। ऐसे में प्रदेश प्रभारी सुखदेव भगत के सामने चुनौती सिर्फ टिकट बांटने की नहीं, बल्कि नेताओं के बीच तालमेल बिठाने की भी है। वरना चुनाव से पहले की खींचतान कहीं चुनाव के बाद की सिरदर्दी न बन जाए!

