चाय पर चर्चा : कबीरधाम जिले की चाय की टपरियों से लेकर सहकारी समितियों के गलियारों तक इन दिनों एक ही चर्चा गर्म है। लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर ऐसा कौन-सा संरक्षण है जिसके चलते एक अंकेक्षण अधिकारी वर्षों से जिले में जमे हुए हैं और पदोन्नति के बाद भी उसी जिले में प्रभाव बनाए हुए हैं? चर्चा यह भी है कि क्या विभागीय नियमों से ऊपर किसी का आशीर्वाद काम कर रहा है?
चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि जिन कार्यों का संचालन अलग-अलग अधिकारियों और कर्मचारियों के माध्यम से होना चाहिए, वहां लगभग हर महत्वपूर्ण निर्णय में एक ही अधिकारी का प्रभाव दिखाई देता है। साख, शिकायत, निर्वाचन, धान खरीदी, प्राधिकृत अधिकारी की नियुक्ति, समितियों के संचालन और अन्य कई मामलों में भी उनके हस्तक्षेप की बातें विभाग के अंदर सुनाई दे रही हैं।
चाय की चर्चा में यह भी सवाल उठ रहा है कि कवर्धा विकासखंड में सहकारिता विस्तार अधिकारी के रूप में लंबे समय तक उनकी भूमिका आखिर किस आदेश और किस नियम के तहत जारी रही? चर्चा करने वाले लोग यह भी पूछ रहे हैं कि यदि नियमों में अन्य पदों के अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान है, तो फिर वर्षों तक व्यवस्था एक ही व्यक्ति के प्रभाव में क्यों रही?
सहकारी समितियों से जुड़े लोगों के बीच यह भी चर्चा है कि कई समितियों में कर्मचारियों के वेतन और मानदेय बढ़ाने में नियमों का पालन नहीं किया गया। आरोप लगाए जा रहे हैं कि समिति की आर्थिक स्थिति और सेवा नियमों को दरकिनार कर फैसले लिए गए। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह किसानों और सहकारी व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय हो सकता है।
लोगों का कहना है कि सहकारिता विभाग में जो भी विवादित निर्णय वर्षों से चर्चा का विषय बने रहे, उनमें इस अधिकारी की भूमिका की जांच होना आवश्यक है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि होना अभी बाकी है।
अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या सहकारिता विभाग इन चर्चाओं और आरोपों की निष्पक्ष जांच कराएगा? क्या यह स्पष्ट किया जाएगा कि लंबे समय तक एक ही जिले में पदस्थ रहने और विभिन्न जिम्मेदारियों का प्रभावी संचालन किन नियमों के तहत हुआ? या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा
चाय की टपरी पर लोग बस इतना कह रहे हैं— “यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो जांच से डर कैसा, और यदि नियमों के विपरीत हुआ है तो जवाबदेही तय होना ही चाहिए।”
पत्रकार दीपक तिवारी

