BREAKING CG NEWS

नेवारी कला: विकास के नक्शे में ‘लापता’ एक गांव!

Share this

फिलिप चाको जिला ब्यूरो बालोद

रायपुर: कहते हैं भारत बदल रहा है। देश चांद पर पहुंच गया, डिजिटल इंडिया का सपना साकार हो रहा है, एक्सप्रेस-वे बिछ रहे हैं और गांवों तक विकास पहुंचाने के दावे हर मंच से गूंज रहे हैं। लेकिन शायद इन दावों के नक्शे में नेवारी कला का नाम छूट गया है।

आखिर नेवारी कला का कसूर क्या है? क्या तंदुला नदी के किनारे बस जाना कोई अपराध था? या फिर मुख्य सड़क से कुछ किलोमीटर भीतर होना ऐसा गुनाह है, जिसकी सजा गांव की कई पीढ़ियां भुगत रही हैं?

यह गांव आज भी सड़क और पुल जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। बरसात आते ही हालात ऐसे हो जाते हैं कि लगता है मानो विकास ने गांव की सीमा पर ही “यू-टर्न” ले लिया हो। एक ओर तादुँला नदी रास्ता रोककर खड़ी है, तो दूसरी ओर कीचड़ से लथपथ सड़क यह याद दिलाती है कि सरकारी फाइलों की रफ्तार शायद आज भी बैलगाड़ी से आगे नहीं बढ़ी।

ग्रामीण बताते हैं कि सड़क निर्माण शुरू तो हुआ, लेकिन उसकी चाल देखकर कछुआ भी शर्म से अपना सिर खोल में छिपा ले। ऐसा लगता है कि ठेकेदार ने काम शुरू करने की रस्म निभाई और विभाग ने निगरानी करने की औपचारिकता। बाकी सब कुछ भगवान भरोसे छोड़ दिया गया।

कहते हैं, सरकारी फाइलें चलती नहीं, “सरकती” हैं। लेकिन नेवारी कला की फाइल तो शायद किसी अलमारी में आराम फरमा रही है। या फिर उस पर जमी धूल ही यह बता रही है कि विकास की गाड़ी यहां पहुंचने से पहले ही पंचर हो चुकी है।

चुनाव आते ही यही सड़क नेताओं के भाषणों में चमचमाती नजर आती है। घोषणाओं के पुल बनते हैं, वादों की सड़कें बिछती हैं और विकास की गंगा बहने लगती है। लेकिन चुनाव खत्म होते ही सड़क फिर कीचड़ में और जनता फिर इंतजार में।

नेवारी कला आज उस कहावत की जीती-जागती तस्वीर है—”एक तरफ कुआँ, दूसरी तरफ खाई।” फर्क सिर्फ इतना है कि यहां एक ओर तादुँला नदी है और दूसरी ओर बदहाल सड़क। बीच में फंसे हैं गांव के लोग, जिनके हिस्से में हर साल केवल आश्वासन आते हैं।

अब सवाल सिर्फ सड़क का नहीं, बल्कि व्यवस्था की संवेदनशीलता का है। आखिर कब तक विकास के भाषणों में गांवों का नाम लिया जाएगा और जमीन पर उन्हें भूल जाया जाएगा? क्या नेवारी कला के लोगों को भी वही सुविधा मिलेगी जो संविधान हर नागरिक को समान अधिकार के रूप में देता है, या फिर यह गांव यूं ही विकास की प्रतीक्षा में अगली कई बरसातें गिनता रहेगा?

क्योंकि लगता है, नेवारी कला तक विकास नहीं पहुंचा… केवल वादों की गूंज पहुंची है।

Share this

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *