Chai Pe Charcha: Are those who opposed the election now the biggest supporters? What exactly is happening in the politics of Kabirdham?
चाय पर चर्चा: पत्रकार: दीपक तिवारी
कबीरधाम की राजनीतिक गलियारों में इन दिनों एक ही चर्चा गर्म है। सवाल यह उठ रहा है कि चुनाव के समय जो नेता उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा के सबसे बड़े विरोधी माने जाते थे, वही आज उनके सबसे करीबी कैसे बन गए? और दूसरी ओर, जिन्होंने चुनाव में दिन-रात मेहनत कर संगठन और प्रत्याशी के लिए पसीना बहाया, वे आज राजनीतिक मुख्यधारा से दूर क्यों दिखाई दे रहे हैं?
विश्वस्त सूत्रों की मानें तो चुनाव के दौरान सियाराम साहू और उनके पुत्र वीरेंद्र साहू विजय शर्मा के टिकट और चुनावी अभियान के विरोध में सक्रिय बताए जाते थे। चर्चा यह भी रही कि साहू समाज के लोगों के बीच जाकर विजय शर्मा को चुनाव न जिताने की अपील की गई। यहां तक कि बड़ी संख्या में लोगों को लेकर एकात्म परिसर में धरना देने और टिकट का विरोध करने की बातें भी राजनीतिक गलियारों में लंबे समय तक चर्चा का विषय रहीं।
चर्चा का बाजार यहीं नहीं रुकता। राजनीतिक हलकों में यह भी कहा जाता है कि शीतल साहू को कांग्रेस में शामिल कराने के नाम पर बड़ी रकम के लेन-देन की चर्चाएं हुईं और गांव-गांव जाकर भाजपा प्रत्याशी के खिलाफ माहौल बनाने का प्रयास किया गया। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है, लेकिन यह बातें आज भी लोगों की जुबान पर हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन लोगों पर कभी विरोध के आरोप लगे, वही आज जब उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा कवर्धा आते हैं तो मंच पर सबसे आगे, स्वागत में सबसे पहले और हर कार्यक्रम में उनके आसपास दिखाई देते हैं। आखिर ऐसा क्या बदल गया?
राजनीतिक चर्चाओं में उमंग पांडे का नाम भी लिया जाता है। कहा जाता है कि चुनाव के दौरान वे भी विरोधी खेमे में माने जाते थे, लेकिन आज उन्हें महत्वपूर्ण संगठनात्मक जिम्मेदारी मिल चुकी है। वहीं चंद्रप्रकाश उपाध्याय को लेकर भी चर्चाएं हैं कि चुनाव के समय कांग्रेस के पक्ष में सक्रिय रहने के बावजूद आज प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, जिला अस्पताल और नगर पालिका से जुड़े करोड़ों रुपये के कार्यों में उनकी मजबूत भागीदारी दिखाई दे रही है।
यदि इन चर्चाओं में सच्चाई है तो सवाल यह उठना स्वाभाविक है कि क्या राजनीति में निष्ठा से अधिक महत्व अवसरवाद का हो गया है? क्या चुनाव के समय पार्टी के लिए संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं की मेहनत का यही परिणाम होना चाहिए कि वे आज किनारे बैठकर तमाशा देखें और विरोध करने वाले सत्ता के सबसे करीबी बन जाएं?
यह चर्चा केवल कुछ नामों तक सीमित नहीं है। जिले में ऐसे कई नेताओं के नाम लिए जा रहे हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि चुनाव के समय वे विरोध में थे, लेकिन आज सत्ता और संगठन दोनों में उनका प्रभाव बढ़ता जा रहा है।
अब सबसे बड़ा सवाल जनता पूछ रही है—क्या मेहनत करने वाले कार्यकर्ताओं का सम्मान होगा, या फिर राजनीति में समय के साथ पाला बदलने वालों की ही पूछ-परख बनी रहेगी?
(नोट: इस लेख में उल्लिखित कई बातें स्थानीय राजनीतिक चर्चाओं और सूत्रों पर आधारित हैं।)

