देश दुनिया वॉच

रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल द्वारा त्वरित इलाज ने दी खून के सबसे खतरनाक कैंसर को मात

Share this

रायपुर: रामकृष्ण केयर अस्पताल के इमरजेंसी वार्ड में बीते दिनों ज़िंदगी और मौत के बीच एक बड़ी जंग लड़ी गई। एक 18 साल का युवक बेहद नाजुक हालत में अस्पताल पहुँचा। उसका हीमोग्लोबिन घटकर 3.5 रह गया था, प्लेटलेट्स मात्र 7,000 थे और शरीर के अंदरूनी हिस्सों से गंभीर रक्तस्राव (Bleeding) हो रहा था।

स्थिति की गंभीरता को देखते हुए उसे तुरंत वेंटिलेटर पर लिया गया। डॉक्टरों ने बिना समय गंवाए इमरजेंसी में ही ‘बोन मैरो’ जांच की, जिसमें APML (एक्यूट प्रोमायलोसाइटिक ल्यूकेमिया) की पुष्टि हुई। इसे ब्लड कैंसर का सबसे घातक रूप माना जाता है, क्योंकि इसमें मरीज के पास बचने के लिए बहुत कम समय होता है।

 

*इलाज और आधुनिक विज्ञान की जीत*

 

मरीज का इलाज तुरंत आधुनिक और सटीक दवाओं (ATRA और ATO) से शुरू किया गया। उसकी हालत को स्थिर करने के लिए खून और प्लेटलेट्स की भारी जरूरत थी, जिसे टीम ने तत्परता से पूरा किया:

 

* 3 यूनिट सिंगल डोनर प्लेटलेट्स (SDP)

* 4 यूनिट एफ.एफ.पी. (FFP)

* 2 यूनिट पी.आर.बी.सी. (PRBC)

 

*चमत्कारी सुधार का सफर*

 

* 48 घंटे के भीतर: मरीज को वेंटिलेटर से हटा दिया गया और उसकी स्थिति बिना दवाओं के स्थिर होने लगी।

* चौथा दिन: मरीज को आईसीयू (ICU) से वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया।

* दसवां दिन: मरीज के प्लेटलेट्स खुद बढ़कर 70,000 हो गए और उसे बाहर से खून चढ़ाने की जरूरत बंद हो गई।

* पंद्रहवां दिन: बोन मैरो की दोबारा जांच की गई, जिसमें कैंसर का कोई अंश नहीं मिला (Complete Remission)।

 

“APML जिसे कभी लाइलाज और जानलेवा माना जाता था, अब सही समय पर इलाज मिलने से 90% से ज्यादा मामलों में पूरी तरह ठीक हो सकता है। हमने सिर्फ बीमारी का इलाज नहीं किया, बल्कि एक 18 साल के युवक को उसका पूरा भविष्य वापस लौटाया है।”

— डॉ. रवि जायसवाल (Oncologist)

 

डॉ. संदीप दवे ने पूरी मेडिकल टीम को इस सफलता पर बधाई दी। उन्होंने कहा कि उस मरीज को अपने पैरों पर चलते हुए देखना, जिसने मौत को इतने करीब से देखा हो, हमारे लिए सबसे बड़ी खुशी है।

 

रामकृष्ण केयर हॉस्पिटल: हम सिर्फ इलाज नहीं करते, हम ज़िंदगी के लिए लड़ते हैं।

Share this

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *