चाय पर चर्चा: कबीरधाम जिला में इन दिनों चाय चौक-चौराहों से लेकर गांव की गलियों तक एक ही चर्चा सुनाई दे रही है — आखिर योजनाओं का पैसा जमीन पर दिख क्यों नहीं रहा?
जनता के बीच सवाल उठ रहे हैं कि कागजों में करोड़ों के विकास कार्य पूरे हो जाते हैं, लेकिन गांवों में सड़क अधूरी, नाली टूटी, भवन जर्जर और तालाब सूखे क्यों दिखाई देते हैं?
चाय की दुकानों में लोग कहते नजर आ रहे हैं कि कुछ जगहों पर काम से ज्यादा बिल और विकास से ज्यादा कमीशन की चर्चा हो रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि कई योजनाओं में “माप बड़ा, काम छोटा” का खेल चल रहा है। कहीं पंचायत भवन चमक रहा है लेकिन अंदर व्यवस्था गायब है, तो कहीं सीसी रोड पहली बारिश में जवाब दे गई।
सबसे ज्यादा चर्चा इस बात की है कि आखिर हर योजना में एक “कट सिस्टम” क्यों सुनाई देता है? गांवों में लोग खुलकर बोल रहे हैं कि बिना प्रतिशत तय हुए फाइल आगे नहीं बढ़ती। कोई कह रहा है कि सप्लायर परेशान हैं, तो कोई कह रहा है कि मजदूरों का पैसा समय पर नहीं मिलता लेकिन कागजों में भुगतान पूरा दिख जाता है।
चर्चा यह भी है कि कई जगह पुराने कामों को नया दिखाकर राशि निकालने की बातें सामने आती रहती हैं। ग्रामीणों का कहना है कि जांच केवल कागजों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि अधिकारियों को सीधे गांव पहुंचकर हकीकत देखनी चाहिए।
अब जनता पूछ रही है:
अगर काम पूरा हुआ तो जनता नाराज क्यों?
अगर पैसा खर्च हुआ तो सुविधा कहां है
अगर सब पारदर्शी है तो शिकायतें लगातार क्यों बढ़ रही हैं
गांवों में यह भी चर्चा तेज है कि ईमानदार अधिकारी और जनप्रतिनिधि भी बदनाम हो रहे हैं क्योंकि कुछ लोगों की वजह से पूरे सिस्टम पर सवाल उठने लगते हैं। जनता चाहती है कि योजनाओं की सोशल ऑडिट खुले मंच पर हो, खर्च का पूरा हिसाब पंचायत भवन में चस्पा हो और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो।
जिला पंचायत और प्रशासन से अब लोगों की उम्मीद बढ़ गई है कि योजनाओं का पैसा वास्तव में जनता तक पहुंचे, सिर्फ फाइलों और फोटो तक सीमित न रहे।
कबीरधाम में चाय पर चर्चा अब केवल चर्चा नहीं रही, बल्कि यह जनता के धैर्य और व्यवस्था पर भरोसे की परीक्षा बनती जा रही है।
पत्रकार दीपक तिवारी

