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क्या राजनीति का शिकार हुए डीएसपी कृष्णा चंद्राकर? क्या रिंकल माटा पर कार्रवाई ही भारी पड़ गई? 

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कवर्धा : शहर में इन दिनों कानून से ज्यादा चर्चा कानून की “सीमा” की हो रही है। सवाल सीधा है—क्या रिंकल माटा से जुड़े ऑनलाइन अवैध सट्टा नेटवर्क तक पहुंचना ही डीएसपी कृष्णा चंद्राकर को महंगा पड़ गया?

 

डीएसपी कृष्णा चंद्राकर के कार्यकाल में कवर्धा ने बदलाव महसूस किया था। अवैध देह व्यापार के खिलाफ सख्त कार्रवाई हुई। आम राहगीरों, विशेषकर महिलाओं को परेशान करने वाले असामाजिक तत्वों को चिन्हित कर जेल भेजा गया। जुआ, सट्टा और अवैध नशे के खिलाफ लगातार छापे पड़े। शहर में यह संदेश गया कि अब “सेटिंग” नहीं, सिर्फ कानून चलेगा।

 

यातायात व्यवस्था में भी अनुशासन दिखा। नियमित चेकिंग और सख्ती से अव्यवस्था कम हुई। त्योहारों—खप्पर ड्यूटी, नवरात्रि, गणेश विसर्जन और जन्माष्टमी—सभी शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुए। लवैध कार्यों में लगातार कार्यवाही और निगरानी के कारण शहर ने पहली बार राहत की सांस ली। डीएसपी कृष्णा चंद्राकर अपने पूरे दल बल के साथ अक्सर खुद पैदल या बाइक पेट्रोलिंग करते देखा जा सकता था। उनकी मौजूदगी ही संदेश थी—कानून जाग रहा है।

 

फिर आया ऑनलाइन अवैध सट्टा का मामला। कार्रवाई हुई। डिजिटल कड़ियां जुड़ने लगीं। चर्चा तेज हुई कि सट्टे का बड़ा पैसा रिंकल माटा तक पहुंचता है। शहर को लगा कि इस बार कहानी जड़ों तक जाएगी।

 

और तभी कहानी में नया मोड़ आ गया!

 

अचानक थाना कोतवाली के DSP का प्रभार बदल गया!

 

अब कवर्धा का आम आदमी पूछ रहा है—

क्या कानून छोटे नामों तक ठीक था, पर बड़े नाम तक पहुंचते ही “प्रशासनिक प्रक्रिया” जाग गई?

क्या रिंकल माटा तक पहुंचना ही वह बिंदु था, जहां से फाइलों की रफ्तार सड़क की रफ्तार से तेज हो गई?

 

लोग यह भी कह रहे हैं कि जरूर एसपी साहब की कोई बड़ी मजबूरी रही होगी। आखिर बिना वजह तो ऐसे समय पर बदलाव नहीं होता। क्या किसी बहुत ही प्रभावशाली नेता का फोन आया होगा? क्या किसी ने बताया होगा कि कानून भी संतुलन से चलना चाहिए? या फिर यह सब महज संयोग है, जो ठीक उसी समय हुआ जब सट्टा नेटवर्क की परतें खुलने लगी थीं?

 

जनता में रोष इसलिए है क्योंकि उन्होंने कवर्धा शहर की कानून व्यवस्था में फर्क महसूस किया था। उन्हें लगा था कि इस बार कार्रवाई दिखावे की नहीं, जमीनी है। लेकिन जैसे ही जांच कथित रूप से रिंकल माटा के दायरे में पहुंची, दिशा ही बदल गई।

 

शहर में अब मुस्कुराते हुए एक पंक्ति कही जा रही है—

 

कानून तो बराबरी की बात करता है,

पर शायद कुछ नाम “संवेदनशील श्रेणी” में आते हैं।

 

आधिकारिक रूप से यह एक सामान्य प्रशासनिक निर्णय है। लेकिन कवर्धा की जनता इसे सामान्य मानने को तैयार नहीं है।

फिलहाल लोग यही कह रहे हैं कि—

जब कानून ने सही दरवाजे पर दस्तक दी, तो दरवाजा नहीं, पहरेदार ही बदल दिया गया।

पत्रकार दीपक तिवारी

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