देवरी। सरकारी विभागों में अक्सर एक कहावत चरितार्थ होती दिखाई देती है—”ऊपर से सब चकाचक, अंदर से सब धड़ाम।” देवरी स्थित महिला एवं बाल विकास विभाग का कार्यालय शायद इसी कहावत का जीता-जागता उदाहरण बन चुका है।
कार्यालय की दीवारों पर नया रंग चढ़ा दिया गया है। पहली नजर में सब कुछ चमकदार दिखता है, लेकिन जैसे ही नजर मुख्य दीवार पर पड़ती है, लंबी-चौड़ी दरारें सारी “विकास गाथा” की पोल खोल देती हैं। ऐसा लगता है मानो विभाग ने सोचा हो—”दरारें मत भरो… उन पर रंग पोत दो, जनता खुद समझ जाएगी कि सब ठीक है।”
लेकिन अफसोस… रंग ने दाग तो छिपाने की कोशिश की, दरारों ने छिपने से साफ इनकार कर दिया।
वर्षों से महिला एवं बाल विकास की योजनाओं का जिम्मा संभालने वाला यह विभाग अपने ही भवन के विकास में इतना लाचार क्यों है? क्या सरकारी फाइलों में इस भवन की मरम्मत भी कभी जन्म लेगी, या फिर किसी बड़ी दुर्घटना के बाद ही कागजों पर स्याही बहेगी?
स्थानीय लोगों के बीच चर्चाएं भी कम दिलचस्प नहीं हैं। सूत्रों के हवाले से तरह-तरह की बातें सुनने को मिलती हैं। लोग चुटकी लेते हुए कहते हैं कि “इस विभाग में कुछ ठेकेदारों का विकास इतनी तेज रफ्तार से हुआ कि कभी साइकिल से आने वाले आज लग्जरी कारों में नजर आते हैं।” इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन क्षेत्र में ऐसी चर्चाएं जरूर तैर रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब विभाग दूसरों के विकास के लिए योजनाओं का अमल कर सकता है, तो अपने ही कार्यालय की जर्जर दीवारों को आखिर क्यों भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है? क्या अधिकारियों की नजरें सिर्फ फाइलों तक सीमित हैं, या फिर दीवारों की चीखें सुनाई ही नहीं देतीं?
विडंबना यह भी है कि यह तस्वीर उसी क्षेत्र की है, जिसे कभी प्रदेश के महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करने का गौरव मिला था। ऐसे में यह जर्जर भवन व्यवस्था पर एक ऐसा सवालिया निशान बनकर खड़ा है, जिसे सिर्फ पेंट की एक परत से नहीं ढका जा सकता।
फिलहाल विभाग की दरारें हर आने-जाने वाले से एक ही सवाल पूछ रही हैं—
“हमारा विकास कब होगा? क्या हमारी किस्मत भी किसी टेंडर का इंतजार कर रही है… या फिर किसी हादसे का?”
अब देखना यह है कि जिम्मेदार अधिकारी इन दरारों को केवल रंग से ढंकने की कोशिश करेंगे या फिर वास्तव में व्यवस्था की इन दरारों को भरने का प्रयास भी करेंगे।
( फिलिप चाको जिला संवाददाता बालोद)

