ज्वलंत समस्या: आज के युवा बात-बात पर क्यों हो जाते हैं उग्र
– सुरेश सिंह बैस “शाश्वत”
आज के युवा और किशोरों में उग्रता और मानसिक तनाव पहले के युवाओं की अपेक्षा कई गुना बढ़ चुकी है अब युवा बात-बात पर उग्र हो जाते हैं जिसकी परिणीति इनके द्वारा किए जाने वाला अनपेक्षित व्यवहार दर्शाता है अतः यह स्पष्ट है कि इंटरनेट और मोबाइल स्वयं समस्या नहीं हैं, बल्कि उनका असंतुलित और अनियंत्रित उपयोग किशोरों के व्यवहार को नकारात्मक दिशा में ले जाता है। जो युवाओं के उग्र व्यवहार में दिखता है।
क्या इस समस्या के मूल में बदलते आधुनिक परिवेश, शिक्षा के भारी दबाव और माता-पिता की उपेक्षा व डिजिटल क्रांति तो नहीं ? वैसे कुछ प्रमुख कारण हैं – सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग, करियर और शिक्षा का दबाव, पारिवारिक अपेक्षाएं, आर्थिक तनाव, और मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी।
एक अध्ययन के अनुसार, भारत में 40% युवा चिंता (एंग्जायटी) से जूझ रहे हैं, जबकि 25% डिप्रेशन के शिकार हैं। इसके अलावा, 2023 में 13,000 छात्रों ने सुसाइड किया, जो करियर स्ट्रेस और मानसिक दबाव का परिणाम था।किशोर अपराध के मामले में, एनसीआरबी की 2023 की रिपोर्ट बताती है कि 79% अपराधी 16-18 वर्ष की आयु के हैं, और इनमें से अधिकांश के परिवार हैं। इसके अलावा, 15% किशोर नशे की गिरफ्त में हैं, जिसमें तंबाकू और शराब सबसे ज्यादा प्रचलित हैं।
आज के युवा उग्र हो रहे हैं, यह एक चिंताजनक विषय है। युवाओं में उग्रता बढ़ने के कारणों में से एक है भविष्य को लेकर अनिश्चितता, जो उन्हें तनावग्रस्त कर देती है। इन दबावों के कारण युवा अपने आप को असुरक्षित और बेचैन महसूस करते हैं। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर परफेक्ट लाइफ की झलकए देखकर वे अपने जीवन से असंतुष्ट हो जाते हैं।
विभिन्न सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक अध्ययनों में यह तथ्य सामने आया है कि जो बच्चे और किशोर अत्यधिक समय इंटरनेट, मोबाइल फोन और सोशल मीडिया पर बिताते हैं,उनमें क्रोध, चिड़चिड़ापन और आक्रामक व्यवहार की प्रवृत्ति अधिक पाई जाती है। इसके पीछे कई कारण हैं।
लगातार मोबाइल और इंटरनेट के प्रयोग से किशोर वास्तविक सामाजिक संपर्क से दूर हो जाते हैं। जब उनका संवाद परिवार और मित्रों से कम होता है, तो वे अपनी भावनाओं को स्वस्थ ढंग से व्यक्त नहीं कर पाते। परिणामस्वरूप, छोटी-छोटी बातों पर भी वे उग्र प्रतिक्रिया देने लगते हैं।इसके अतिरिक्त, सोशल मीडिया पर दिखाई जाने वाली तुलना की संस्कृति, आक्रामक भाषा, और नकारात्मक टिप्पणियाँ किशोरों के मन पर गहरा प्रभाव डालती हैं। वे अवचेतन रूप से उसी व्यवहार को अपनाने लगते हैं। ऑनलाइन खेलों और वीडियो में दिखाई जाने वाली हिंसा और त्वरित उत्तेजना भी उनके धैर्य को कम करती है।
शोध यह भी दर्शाते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम से नींद की कमी, मानसिक थकान और एकाग्रता में गिरावट आती है। जब शरीर और मन दोनों थके होते हैं, तो आत्म-नियंत्रण कम हो जाता है, जिससे उग्रता बढ़ना स्वाभाविक है।आज का किशोर उग्र इसलिए नहीं है कि वह गलत है, बल्कि इसलिए कि वह सुना जाना चाहता है, समझा जाना चाहता है। उसकी उग्रता एक संकेत है-ध्यान देने का, संवाद बढ़ाने का और सही दिशा देने का।
यदि परिवार, विद्यालय और समाज मिलकर उसे समझदारी और संवेदनशीलता से मार्गदर्शन दें, तो यही किशोर कल का संयमित, सशक्त और जिम्मेदार नागरिक बन सकता है।आज के किशोरों को ऐसे आदर्श मिलें, या परिचय करना होगा जो संयम, सहिष्णुता और करुणा का उदाहरण प्रस्तुत करें।माता-पिता और शिक्षकों को किशोरों की बात धैर्य से सुननी चाहिए, न कि तुरंत निर्णय देना चाहिए। विद्यालयों में भी जीवन कौशल, ध्यान, योग और भावनात्मक प्रबंधन को स्थान दिया जाने की आवश्यकता है। तकनीक का उपयोग सीमित और उद्देश्यपूर्ण हो-यह सिखाना आवश्यक है।
अभिभावक बच्चों के साथ प्रतिदिन संवाद का समय तय करें।उपदेश देने के बजाय सुनने की आदत विकसित करें।बच्चे की भावनाओं को नकारने के बजाय उन्हें स्वीकार करें।जब युवा को सुना जाता है, तो उसे उग्र होने की आवश्यकता नहीं पड़ती।बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की स्पष्ट सीमा तय करें।सोने से कम से कम 1 घंटा पहले मोबाइल बंद करने की आदत डालें।अभिभावक किशोरों के नियंत्रण के साथ विश्वास भी दिलाना आवश्यक है, केवल प्रतिबंध नहीं वही मोबाइल को पुरस्कार या दंड का माध्यम न बनाए।
अभिभावक स्वयं संयमित भाषा और व्यवहार अपनाएँ।घर में तनाव, झगड़े और हिंसक संवाद से बचें।बच्चे वही सीखते हैं जो वे देखते हैं।खेल, संगीत, कला, योग और पढ़ने की आदत विकसित करें।बच्चों को उनकी रुचि पहचानने में सहायता करें।ऊर्जा का सही उपयोग उग्रता को सकारात्मक दिशा देता है।सरकार की भी भूमिका इसमें सकारात्मक होने अनिवार्य है पाठ्यक्रम में भावनात्मक शिक्षा, जीवन कौशल और मानसिक स्वास्थ्य को शामिल किया जाए।परीक्षा-केंद्रित व्यवस्था के बजाय व्यक्ति-केंद्रित शिक्षा पर बल दिया जाए।बच्चों के लिए डिजिटल सुरक्षा कानून और सख्त पालन।नेट और फिल्मों में हिंसक और नकारात्मक कंटेंट पर सरकार को अंकुश लगाना चाहिए।आयु-आधारित कंटेंट फ़िल्टर को अनिवार्य किया जाए।विद्यालयों में परामर्शदाता (काउंसलर) की नियुक्ति।किशोर मानसिक स्वास्थ्य हेल्पलाइन और केंद्रों का विस्तार।
समय पर मार्गदर्शन उग्रता को गहराने से रोक सकता है।सरकार द्वारा अभिभावक प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जाएँ।डिजिटल पालन-पोषण पर कार्यशालाएँ हों।अभिभावक और शासन को एक. दूसरे के पूरक के रूप में संयोजन बनाकर काम करना अति आवश्यक है। किशोरों और युवा की उग्रता कोई अपराध नहीं, बल्कि एक संकेत है-संकेत कि उन्हें दिशा, समय और समझ की आवश्यकता है। यदि अभिभावक मार्गदर्शक बनें और शासन संरक्षक, तो आज का उग्र किशोर कल का संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बन सकता है।
मोबाइल की रोशनी में
बुझते रिश्तों के दीप,
खामोश मन में पलता है
अनकहा सा क्षोभ
उग्रता नहीं अपराध,
यह पीड़ा की है पुकार,
सुन लो आज युवा को,
यही कल का होगा।।
– सुरेश सिंह बैस शाश्वत
बिलासपुर छत्तीसगढ़

