अमरकंटक

ओशोधारा की स्थापना के रजत जयंती वर्ष में अमरकंटक में हुआ भव्य आयोजन

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ओशोधारा की स्थापना के रजत जयंती वर्ष में अमरकंटक में हुआ भव्य आयोजन

अमरकंटक/ अजीत सिंह गहलोत ( पेंड्रा रोड) – आज के व्यस्त जीवन में मनुष्य को वैज्ञानिक पद्धति से आध्यात्मिक ऊंचाइयों पर ले जाते हुए उसे खुशहाल जीवन जीने की कला सिखाने और गोविंद की प्राप्ति तक की यात्रा कराने वाली आध्यात्मिक संस्था ओशोधारा की स्थापना के रजत जयंती वर्ष में तपोभूमि अमरकंटक में ध्यान एवं निरति योग शिविर का आयोजन 1 से 6 मई तक किया जा रहा है विदित हो कि 25 वर्ष पूर्व 1998 में ओशोधारा के संस्थापक समर्थ गुरु सिद्धार्थ औलिया जी ने अपने कुछ साधक मित्रों के साथ अमरकंटक में पहला ध्यान योग का कार्यक्रम आयोजित किया था 25 वर्ष पूर्व 21 साधकों के साथ आरंभ हुई यह यात्रा अब विशाल वट वृक्ष की भांति देश-विदेश में फैल चुकी है तथा आज सत्तर हजार से अधिक साधक मित्र संस्था से जुड़करअपने आत्म विकास की ओर अग्रसर है ।
अमरकंटक में आयोजित इस शिविर में तीन सौ से अधिक सहभागी शामिल हो रहे हैं आयोजन के प्रथम दिवस सर्वप्रथम समर्थ गुरु सिद्धार्थ औलिया ने मां नर्मदा मंदिर में पूजा अर्चना के साथ मां नर्मदा की भव्य आरती अपने सभी साधकों के साथ की इस अवसर पर उन्होंने सनातन धर्म,धार्मिक कर्मकांड पूजा एवं उपासना की विविध पद्वतियों के महत्व को समझाते हुए बताया कि भारतवर्ष में अनेक आक्रांताओ ने भारत की सनातन संस्कृति को नष्ट करने का प्रयास किया किंतु आज पूरे विश्व में भारत का सनातन धर्म ही सर्वश्रेष्ठ धर्म के रूप में स्थापित है जो सभी को स्वीकार करता है भारत का सनातन धर्म ही विश्व के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है ।
समर्थ गुरु सिद्धार्थ औलिया ने अमरकंटक क्षेत्र में स्थित सोनमुड़ा, माई की बगिया , कबीर चबूतरा , कपिलधारा और शम्भूधारा का दर्शन किया तथा प्रत्येक स्थल की पौराणिक मान्यताओं के बारे में विस्तार से अपने साधकों को जानकारी दी साथ ही यह बताया कि किस प्रकार 25 वर्ष पूर्व माई की बगिया सोनमुड़ा एवं कबीर चबूतरा में ओशो धारा के प्रथम ध्यान योग शिविर का आयोजन किया गया था । ओशो धारा के इस ध्यान एवं निरति योग शिविर में जहां एक और साधकों को ध्यान के विविध प्रयोग कराए जा रहे हैं वहीं निरति योग में आत्मा के प्रकाश स्वरूप से परिचित कराया जा रहा है ।
अपने साधकों को संतत्व की राह पर चलने के लिए समर्थ गुरु सिद्धार्थ औलिया ने मंगल उपनिषद पर विस्तार से चर्चा करते हुए साधकों को बताया कि परमात्मा मंगलमय है, वह किसी का अनिष्ट नहीं करता है निराकार गोविंद की साकार अभिव्यक्ति भगवान विष्णु है अतः प्रत्येक साधक को भगवान विष्णु से मंगल की प्रार्थना करनी चाहिए जैसे-जैसे साधक अपने जीवन में मंगलभाव को विकसित करता है और अपने निकटतम लोगों के लिए मंगल की कामना करता है उसका स्वयं का जीवन भी मंगलमय होना प्रारंभ हो जाता है अतः प्रत्येक साधक को इस संपूर्ण जगत के मंगल के लिए अपने जीवन के सभी आयामो में कार्य करना चाहिए ताकि विश्व के कल्याण के साथ-साथ उसका भी मंगल हो सके ।
शिविर के चौथे दिन साधकों ने भक्ति और उल्लास के साथ कीर्तन करते जमकर नृत्य किया इस अवसर पर शांति कुटीर के महंत स्वामी रामभूषणदास जी भी शामिल हुए शिविर के विभिन्न सत्रों का संचालन आचार्य दर्शन आचार्य चेतन एवं आचार्य अमरेश जी ने किया ।

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