प्रांतीय वॉच

ग्राम पंचायत गोविंदपुर, ग्राम पंचायत माकड़ी ख़ुना में 3 साल से नहीं हो रहा है ऑडिट

  • इन दोनों पंचायतों में बाहर से आते हैं ऑडिट करने वाले

अक्कू रिजवी/कांकेर : कांकेर भारत में पंचायती राज की स्थापना इस आशा के साथ की गई थी कि छोटे-छोटे गांव भी इससे आत्मनिर्भर हो सकेंगे और गांव की अपनी सरकार अपने लोगों की लोकतांत्रिक ढंग से सेवा करेगी । लेकिन विगत कुछ वर्षों से यह देखा जा रहा है कि ग्राम पंचायतों में भी भारी भ्रष्टाचार शुरू हो गए हैं। राजीव गांधी के प्रधानमंत्रित्वकाल में पंचायत राज योजना को सारे भारत में लागू कर दिया गया था तथा भ्रष्टाचार से बचाने हेतु पंचायत के लेखों की ऑडिट की भी व्यवस्था की गई थी। नियमानुसार ग्राम पंचायत की ऑडिट प्रतिवर्ष होनी चाहिए किंतु ऐसा ना होने पर ग्राम पंचायत के सचिव सरपंच आदि भ्रष्टाचार करने को स्वतंत्र हो जाते हैं। ऑडिट होने पर पंचायत के तमाम लेखा पुस्तकों तथा बैंक अकाउंट आदि का लेखा-जोखा देखकर ऑडिटर किसी भी भूल चूक अथवा जानबूझकर की गई गड़बड़ी को पकड़ लेते हैं । यदि ऑडिटर ऑडिट ही नहीं करेंगे तो पंचायतों में कुछ भी हो सकता है। कांकेर जिले में कुछ ऐसा ही हो रहा है। जहां फिलहाल उदाहरण के तौर पर ग्राम पंचायत माकड़ी खूना तथा गोविंदपुर के उल्लेख किए जा सकते हैं। जहां तीन सालों से ऑडिटर नहीं आए हैं और ऑडिट कराने हेतु कोई प्रयत्न भी नहीं किया गया है । इससे यह आशंका हो गई है कि इन दो विशेष ग्राम पंचायतों में (जो कांकेर जिला मुख्यालय से बिल्कुल लगी हुई हैं ) अंदरूनी तौर पर भारी भ्रष्टाचार अवश्य ही हुआ होगा। जिसका पता लगाना राज्य सरकार के लिए अति आवश्यक है अन्यथा यह बीमारी अन्य जिलों में भी फैल सकती है। जिसके कारण पंचायती राज की स्थापना के मूल उद्देश्य ही समाप्त हो जाएंगे तथा सरकार को करोड़ों का चूना लगेगा वह अलग है। राज्य सरकार के उच्च अधिकारियों को इस ओर शीघ्र अति शीघ्र ध्यान देना चाहिए।

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