संतोष ठाकुर/बिलासपुर
बरसो रे,सावन तुम मेरे, बरसो रे घन रे!
नील गगन पर घन की छाया
कहाँ – कहाँ से उड़कर आया
विश्व विमोहित तुम्हें देखता
उतरो बन – ठन रे!
बरसो रे,सावन तुम मेरे, बरसो रे घन रे!
धरती प्यासी नदियाँ प्यासी
तरुवर की सब कलियाँ प्यासी
जग जीवन का ताप मिटाने
बरसो कण – कण रे !
बरसो रे,सावन तुम मेरे, बरसो रे घन रे!
तुम आए संग पुरवा आई
अंग – अंग में अगन लगाई
मेरे मन क्यों उमड़ – घुमड़ कर
करता नर्तन रे !
बरसो रे,सावन तुम मेरे, बरसो रे घन रे!
प्रिय की याद लिए तुम आए
तन झूमे नाचे मन गाए
अरे ! सघन तुम नेह विरल बन
उतरो छन – छन रे!
बरसो रे,सावन तुम मेरे, बरसो रे घन रे!

