प्रांतीय वॉच

व्यंजन के साथ औषधीय गुणों से युक्त सिंघाड़ा के खेती,धान से ज्यादा मिलेंगी आमदनी

* देश के सुविख्यात कृषि वैज्ञानिकों डॉक्टर गजेंद्र चंद्राकर, और डॉक्टर सुदर्शन सूर्यवंशी के मार्गदर्शन में तालाबनिर्माण हुआ पूरा |

नवागढ़ ब्यूरो (संजय महिलांग ) | इस बार समय से मानसून के दस्त देने से फसल अच्छी होने की संभावना बढ़ी है. खरीब फसलों के साथ बरसात के मौसम में परंपरगत खेती के अतिरिक्त लाभ पाने के लिए सिंघाड़ा की बुवाई भी शुरू होने वाली हैं. बरसात के मौसम में घर के आस-पास तालाब व नदी-नाले सभी पानी से लबालब भर जाते हैं. इन जलाशयों में सिंघाड़ा की खेती शुरू कर किसान अतिरिक्त आमदनी ले सकते हैं. मत्स्य पालन करने वाले किसानो के लिए तालाब में भी सिंघाड़ा के बेल लगाना ज्यादा फायदेमंद होगा और किसानों को इससे दोगुणा लाभ होगा. सिंघाड़ा की खेती चूंकि मीठे पानी वाले तालाबों में होता है, इसलिए इसे पानी फल के नाम से भी जाना जाता है. बेमेतरा जिला के नवागढ़ निवासी युवा किसान किशोर राजपूत ने पोषक तत्वों से भरपूर सिंघाड़ा की खेती करने के लिए देश के सुविख्यात कृषि वैज्ञानिकों डॉक्टर गजेंद्र चंद्राकर, और डॉक्टर सुदर्शन सूर्यवंशी के मार्गदर्शन में 2 एकड़ में खेती करेगा । सिंघड़ा की बाजारों में हमेशा मांग बनी रहती है. इसलिए कि यह कई औषधीय गुणों से भरपूर है और व्यवासियक तौर पर इसका आटा भी तैयार किया जा रहा है. सिंघाड़ा को सुखा कर जो आटा तैयार किया जाता है उसका इस्तेमाल कई तरह के व्यंजन व आयुर्वेदिक दवा बनाने में किया जाता है.

खेती की विधिः

युवा किसान किशोर राजपूत ने बताया कि वैसे तो बरसात के मौसम में ही सिंघाड़े की खेती शुरू होती है. किसान अपने आस-पास के नहरों, पोखरों और तालाबों में सिंघाड़ा के बेल डाल सकते हैं. मछली पालन केंद्र में व्यापक पैमाने पर सिंघाड़ा की खेती शुरू की जा सकती है. पश्चिम बंगाल में मछली पालन वाले तालाबों में सिंघाड़ा की खेती होती रही है. छत्तीसगढ़ राज्य में लिंगनाडीह में स्वयं वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर गजेंद्र चंद्राकर मखाना और सिंघाड़ा की खेती कर नए कीर्तिमान स्थापित किए हैं उनसे प्रेरणा लेकर अनेक किसान इसकी खेती शुरू कर रहे हैं। तो दूसरी ओर कृषि विज्ञान केंद्र धमतरी के डॉक्टर सुदर्शन सूर्यवंशी के नेतृत्व में सैंकड़ो किसान नवाचार करने के लिए तैयार हो गए हैं कई प्रयोग भी सफल रहा है। राज्य में किसानों समेत मछुआरे व मछली व्यवसायी भी सिंघाड़ा की खेती में रुचि ले रहे हैं. बरसात में सिंघाड़ा की खेती शुरू होने से पहले अप्रैल मई में ही जलाशयों में सिंघाड़ा की नर्सरी तैयार कर ली जाती है.बरसात में अपने आस-पास के तालाब व जलाशयों में सिंघाड़ा की खेती करने के इच्छुक किसान नर्सरी पाने के लिए स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र जिला कृषि के दफ्तर से भी संपर्क कर सकते हैं. व्यवासियक तौर पर सिंघाड़ा की खेती करने वाले किसान मीठे पानी के तालाब या किचड़युक्त जलाशय में बीज डाल देते हैं. दो माह के अंदर सिंघाड़ा के बेल तैयार हो जाता है. बरसात में जुन- जलाई में सिंघाड़ा का बेल निकाल लिया जाता है और उसे खेती के लिए चुने गए तालाब व अन्य जलाशयों में डाल दिया जाता है. बेल डालने के दो माह के अंदर सिंघाड़ा तैयार हो जाता है. सितंबर से लेकर नवंबर दिसंबर तक सिंघाड़ा की बिक्री होती है.सिंघाड़ा की खेती को बढ़ावा देने के लिए सरकारी स्तर पर इसकी नर्सरी उपलब्ध कराने की व्यवस्था की जा रही है. नदी नालों की भूमि होने के कारण छत्तीसगढ़ में उच्च गुणवत्ता वाले सिंघाड़ा की खेती व्यापक पैमाने पर हो सकता है. यहां के किसान एक ही तालाब में मत्स्य पालन के साथ सिंघाड़ा की भी खेती कर सकते हैं. अन्य राज्यों के किसान भी मछली पालन वाले तालाब में सिंघाड़ा की खेती शुरू कर दोहरा लाभ कमा रहे हैं.

सिंघाड़ा की खेती से होने वाले मुनाफाः

परंपरागत खेती करने वाले ग्रामीण किसान सिंघाड़े की खेती की कर अच्छी खासी आय कर सकते हैं. इसमें कम लागत आती है. मछली पालन के साथ सिंघाड़ा की खेती से दोहरा लाभ होता है. किसानों के पास सिंघाड़ा की खेती करने के लिए अपना तालाब या जलाशय नहीं है तो वे ग्राम पंचायत से इसके लिए संपर्क कर सकते हैं. ग्राम सभा सिंघाड़ा के खेती के लिए तालाब और जलाशय किसानों को पट्टा पर उपलब्ध कराती है. इसके लिए मामुली शुल्क देकर कोई भी किसान ग्रामसभा की मदद से तालाब पट्टा पर ले सकता है और सिंघाड़ा की खेती शुरू कर सकता है. प्रति हेक्टेयर भूमि से 25-30 टन सिंघाड़ा का फल तोड़ना संभव है.बाज़ार भाव के अनुसार लगभग 70 से 1 लाख रुपये की आमदनी मिल सकता हैं।

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