प्रांतीय वॉच

दुनिया के मजदूरों तुम एक हो जाओ…. तुम्हारे पास खोने को कुछ नहीं है और पाने को पूरी दुनिया है…. कार्ल मार्क्स…. 1 मई मजदूर दिवस

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महेन्द सिंह/पांडुका/नवापारा/राजिम/रायपुर : मजदूर वे सभी हैं जो शारीरिक श्रम करें या ऑफिस में बैठकर फाइलों के बोझ तले दबे लोग मानसिक श्रम करते हुए जिंदगी गुजार देते हैं। 1 मई पूरे विश्व में मजदूर दिवस के रूप में मनाया जाता है। पूरे विश्व परिदृश्य में अनादि काल से मजदूर वर्ग जिस मुसीबत और भयंकर कष्टकारी जिंदगी जीता था उसे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे एक उदाहरण अफ्रीका के नीग्रो लोगों की अमेरिका और यूरोपीय देशों में भेड़ बकरी सब्जी भाजी जैसे मंडी लगती थी जिसमें पुरुषों के साथ महिलाओं और लड़कियों को जैसे सब्जी भाजी भेड़ बकरी जैसे टटोलकर देखकर लिया जाता है वैसे आमानवीय ढंग से लेकर मजदूरी का काम बेदर्दी से कराते हुए गोरे लोगों के द्वारा उनका जमकर शारीरिक मानसिक दोनों तरह का शोषण किया जाता था और अधिकांश यह गुलाम रूपी मजदूर असमय दम तोड़ देते थे फिर बहुत सारी क्रांतियां हुई हम19वीं शताब्दी में यहा भारत के उत्तर प्रदेश और बिहार से अंग्रेजों द्वारा गन्ने की खेती हेतु गिरमिटिया मजदूर के रूप में मारीशस, सुरीनाम ,फीजी और अन्य अफ्रीकी देशों में इनको पानी के जहाज में भेड़ बकरी जैसा भरकर ले जाया गया और जिस मुसीबत और कठिनाई से हमारे पूर्वजों ने जिंदगी गुजारी उसको सुनकर आपकी आंखों से अविरल अश्रु धारा बह उठेगी। भले आज स्थिति दूसरी हो वहां भारतीयों की अच्छी खासी संख्या है और इनमें से कई उस देश के प्रधानमंत्री राष्ट्रपति के साथ अन्य महत्वपूर्ण पदों में काम किया है और कर रहे हैं। 1 मई मजदूर दिवस आज के परिपेक्ष में देखते हैं चाहे मौसम की मार हो या भीषण करोना कॉल इन्हें तो काम करना है। इस संबंध में छत्तीसगढ़ वाच ब्यूरो प्रमुख महेंद्र सिंह ठाकुर ने मजदूरों से बात की इनमें पांडुका के युवा मजदूर नंदू पटेल जो अपनी बाड़ी में काम कर रहा था उससे पूछा गया आज मजदूर दिवस है तो उसने छत्तीसगढ़ी में कहा काला कथे मजदूर दिवस
उसे लगा कोई कथा कहानी है पूरी बात समझाने और बताने पर वह हंसने लगा यह हंसी हमारी सरकारी व्यवस्था पर थी। गोबरा नवापारा के हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी के निर्माणाधीन भवनो में काम कर रही मजदूर सुकारो बाई और झाडूराम से पूछने पर उन्होंने भी छत्तीसगढ़ी में प्रश्न किया ये काय हरे, कोन मना थे नई जानन बताए जाने पर उन्होंने वही किया जो नंदू पटेल ने किया था हां यह जरूर जोड़ा कि हमर फोटो ला अखबार में झन डारबे साहब करो ना कॉल में ले देके काम मिले हे ठेकेदार हा छोड़वा दीही काबर मोदी हा अब्बड दिन के कहा थे कोरोना हर फेर लहुट गे हे घर में रहव अब्बड़ दिन ले रेहेन घर में रबो तो बड़े जान परिवार हावे कैइसे चलही। मजदूर दिवस सरकार हा मनाय। कमतर यह स्थिति पूरे देश में है। ऊंची ऊंची गगनचुंबी इमारतें, सड़क पुल, भव्य होटल खेत खलिहान सब जगह इन श्रम वीरो का पसीना बहा है हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता बेहद प्रासंगिक है,,, वह तोड़ती पत्थर,, जिसे मैंने देखा इलाहाबाद के पथ पर,, कोई ना छायादार पेड़ जिसके तले बैठी हुई स्वीकार,,,, श्याम तन, भर बंधा यौवन ,,, नत नयन प्रिय कर्म रत मन,,,,,,,,, वह तोड़ती पत्थर,,,,, कितना मार्मिक मस्त मौला गरीबों के मसीहा फक्कड़ कवि निराला जी ने कैसी तस्वीर खींची है एक मजदूर महिला की जो आज भी जीवंत है।आइए हम सब मिलकर इन कर्म वीरो को नमन करते हैं।

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