नई दिल्ली: ( गोकुल सोनी ) साथियों, मेले तो आपने बहुत देखे होंगे, लेकिन क्या आपने कभी ऐसा मेला सुना है, जिसका नाम सुनते ही गांव की महिलाएं अपने पतियों को सावधान कर दिया करती थीं ?
आज मैं आपको छत्तीसगढ़ के एक ऐसे ही भूले-बिसरे मेले की कहानी बताने जा रहा हूं, जिसके बारे में आज की पीढ़ी के 95 प्रतिशत से ज्यादा लोगों को शायद कोई जानकारी नहीं है।
नाम था— ‘किसबिन मेला’
यह कोई सामान्य मेला नहीं था। कभी काठा कोनी और तखपुर के बीच होली से पहले यह मेला लगा करता था। दिलचस्प बात यह है कि उस दौर में न मोबाइल था, न सोशल मीडिया, न व्हाट्सऐप फिर भी हर साल एक निश्चित समय पर दूर-दूर से महिलाएं यहां पहुंच जाया करती थीं।
अब सवाल उठता है—आखिर ये किसबिन कौन थीं और यहां क्यों आती थीं ?
पहले ‘किसबीन’ शब्द का मतलब समझिए
छत्तीसगढ़ के गांव-कस्बों में पुराने समय में झगड़े के दौरान महिलाएं एक-दूसरे को कई तरह के शब्दों से संबोधित करती थीं। उनमें ‘बंचक’ और ‘किसबिन’ जैसे शब्द भी सुनने को मिलते थे।
‘बंचक’ शब्द आम बोलचाल में ऐसी महिला के लिए इस्तेमाल किया जाता था, जिसके चरित्र को लेकर समाज में तरह-तरह की बातें कही जाती हों।
वहीं ‘किसबिन’ शब्द का एक पुराना शाब्दिक अर्थ कस्बों में नृत्य करने वाली महिला से जुड़ा बताया जाता है। समय के साथ इस शब्द का अर्थ और सामाजिक संदर्भ बदलता गया और यह एक गाली के रूप में भी इस्तेमाल होने लगा। लेकिन असली कहानी तो अब शुरू होती है।
पेड़ के नीचे सजता था यह अनोखा मेला
होली के कुछ समय पहले, जब खेतों की फसल कट चुकी होती थी और धान की मिंजाई के बाद किसानों के हाथ में पैसा आता था, तब इन महिलाओं का यहां जमावड़ा होता था।
कहा जाता है कि उस समय इलाके में बड़े-बड़े दाऊ, गौंठिया और मालगुजार हुआ करते थे। इन्हीं संपन्न लोगों को अपना ग्राहक बनाने के लिए ये महिलाएं यहां आती थीं। इनकी संख्या बहुत ज्यादा नहीं होती थी, कभी 8, 10, 12 या 15 के आसपास।
पेड़ों के नीचे गीत-संगीत और नृत्य चलता था। कुछ महिलाएं आसपास के गांवों में किराये का मकान लेकर कई दिनों तक ठहरती थीं। मोबाइल के जमाने से पहले बिना किसी संपर्क माध्यम के हर साल एक ही समय पर इनका यहां पहुंचना भी अपने आप में कम रोचक बात नहीं थी।
और फिर इस मेले की खबर विधानसभा तक पहुंच गई
कहानी का सबसे दिलचस्प अध्याय तब शुरू हुआ जब बिलासपुर के वरिष्ठ पत्रकार श्री प्राण चड्ढा जी ने इस अनोखे मेले के बारे में नवभारत में लिखा। खबर प्रकाशित होते ही मामला इतना चर्चित हुआ कि भोपाल विधानसभा तक इसकी गूंज पहुंच गई।
स्थानीय विधायक और प्रशासन के लिए यह बात ही अविश्वसनीय थी कि उनके इलाके में ऐसा कोई मेला वर्षों से लगता आ रहा है। इसके बाद शशि कोन्हेर जी सहित कई पत्रकारों ने इस विषय को उठाया। पुलिस सक्रिय हुई, गांव वालों ने भी विरोध शुरू किया और धीरे-धीरे इस मेले पर रोक लगने लगी। 1984-85 के आसपास यह सिलसिला पूरी तरह समाप्त हो गया।
किसबिन मेला या देह-व्यापार का अड्डा
स्थानीय चर्चाओं में यह भी कहा जाता था कि नृत्य और संगीत की आड़ में देह-व्यापार भी होता था। इलाके के संपन्न किसानों, जमींदारों और गौंटियाओं को आकर्षित करने की बातें भी कही जाती थीं।
इन बातों में कितना सच था और कितना उस दौर की लोकचर्चा, यह अलग शोध का विषय है। लेकिन इतना जरूर है कि इस मेले ने उस समय समाज में खूब चर्चा और विवाद पैदा किया था।
और गांव की महिलाओं की वह चेतावनी… …………….
इस मेले की चर्चा इतनी थी कि गांव की महिलाएं जब कुएं, तालाब या पनघट पर मिलती थीं तो एक-दूसरे को मजाकिया अंदाज में चेताती थीं—
“तोर घर वाला ला बने संभाल के राखबे, वो कोती किसबिन उतरे हे। यानी
“अपने पति को संभालकर रखना, उधर किसबिन आ गई है ” ठीक उसी तरह जैसे मां बच्चे से कहती है बाहर घूमने मत जाना बच्चा पकड़ने वाला आया है।
सोचिए, उस जमाने में जब न फेसबुक था, न इंस्टाग्राम और न मोबाइल फिर भी किसी मेले की चर्चा इतनी दूर तक पहुंच जाती थी कि गांव की चौपाल से लेकर विधानसभा और फिर दिल्ली-बंबई के पत्रकारों तक उसकी खबर पहुंचती थी।
दिल्ली और बंबई से भी पत्रकार पहुंचे थे………….
स्थानीय अखबारों में लगातार खबरें आने के बाद इस मेले ने देश के दूसरे हिस्सों का भी ध्यान खींचा। कहा जाता है कि दिल्ली और बंबई के पत्रकार भी यहां पहुंचकर इसकी रिपोर्टिंग किया करते थे। आज शायद ही किसी को विश्वास होगा कि छत्तीसगढ़ की धरती पर कभी ऐसा मेला लगता था, जिसकी चर्चा इतनी दूर तक हुई थी।
और आज…?
आज उस मेले का नाम लेने वाले भी बहुत कम बचे हैं। समय के साथ मेले खत्म हो गए, किरदार चले गए, किस्से दब गए और एक पूरा अध्याय हमारी स्मृतियों से लगभग गायब हो गया।
लेकिन इतिहास सिर्फ राजाओं और युद्धों का नहीं होता। इतिहास उन घटनाओं का भी होता है, जिन्हें समाज कभी खुले में स्वीकार नहीं करता, लेकिन जो कभी उसकी जिंदगी का हिस्सा रही होती हैं। किसबीन मेला भी छत्तीसगढ़ के सामाजिक इतिहास का ऐसा ही एक अनसुना और विवादित अध्याय है।
साथियों, क्या आपने कभी ‘किसबिन मेला’ के बारे में सुना था ? क्या आपके घर के किसी बड़े-बुजुर्ग, दादा-दादी, नाना-नानी या गांव के किसी पुराने व्यक्ति ने इस मेले के बारे में कभी बताया है ?
अगर आपने इसके बारे में कुछ सुना है, या आपके पास इससे जुड़ी कोई पुरानी कहानी, जानकारी, जगह या याद है तो नीचे कमेंट में जरूर लिखिए।
हो सकता है आपकी एक छोटी-सी जानकारी छत्तीसगढ़ के इतिहास के इस भूले-बिसरे पन्ने को फिर से सामने लाने में मदद कर दे। क्योंकि कुछ मेले खत्म हो जाते हैं लेकिन उनकी कहानियां पीढ़ियों तक जिंदा रहती हैं।

