खबर है कि सरकार के तीन मंत्रियों का परफॉर्मेंस शीर्ष स्तर पर काफी खराब माना गया है। पार्टी संगठन के आकलन में तीनों की अपने-अपने विभागों में पकड़ कमजोर बताई जा रही है। विभागीय स्तर पर भी नाराजगी की बातें सामने आ रही हैं। साथ ही भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों की संख्या भी काफी बताई जा रही है।
सुशासन अभियान के तुरंत बाद प्रदेश संगठन के प्रमुख पदाधिकारी अजय जम्वाल और पवन साय ने सभी मंत्रियों के साथ बैठक कर विभागों में कसावट लाने और शिकायतों को दूर करने की हिदायत दी थी। मगर चर्चा है कि तीनों मंत्रियों के कामकाज पर इसका कोई खास असर नहीं पड़ा। ऐसे में उन्हें बदले जाने पर गंभीरता से विचार होने की खबर है। हालांकि नगरीय निकाय उपचुनाव को देखते हुए उन्हें फिलहाल कुछ और मोहलत दी जा सकती है। तीनों को अलग-अलग बुलाकर समझाइश दिए जाने की भी संभावना है। अब आगे क्या होता है, यह देखने वाली बात होगी।
बृजमोहन की नाराजगी की चर्चा
छत्तीसगढ़ ओलंपिक संघ की बैठक में सांसद बृजमोहन अग्रवाल एक बार फिर शामिल नहीं हुए। चर्चा है कि अग्रवाल कार्यकारी अध्यक्ष नहीं बनाए जाने से नाखुश हैं। करीब सालभर पहले उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाए जाने पर सहमति जताई गई थी, लेकिन आदेश जारी नहीं हो पाया।
ओलंपिक संघ अब राष्ट्रीय खेल की मेजबानी की तैयारियों में जुटा है। सीएम विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में हुई बैठक में राष्ट्रीय खेल के आयोजन की तैयारियों पर चर्चा हुई। फिलहाल संघ में किसी और को जिम्मेदारी दिए जाने की संभावना नहीं है। ऐसे में बृजमोहन की नाराजगी को तवज्जो मिलने की संभावना कम ही दिख रही है। उपाध्यक्ष होने के नाते उन्हें आगामी बैठकों की सूचना दी जाएगी, लेकिन बैठक में आने के लिए कोई खास जोर नहीं दिया जाएगा। न ही किसी तरह की मान-मनौव्वल की जाएगी।
आवास पर आमने-सामने
प्रधानमंत्री आवास को लेकर डिप्टी सीएम विजय शर्मा और पूर्व सीएम भूपेश बघेल आमने-सामने हैं। विजय शर्मा ने भूपेश सरकार पर आवासहीनों की उपेक्षा का आरोप लगाते हुए 18 लाख आवासों का निर्माण रोके जाने का जिक्र किया था। भूपेश ने इसका तीखा प्रतिवाद किया और डिप्टी सीएम को चुनौती दी। जवाब में विजय शर्मा ने सार्वजनिक बहस की चुनौती दे दी। भूपेश ने भी इसे स्वीकार कर लिया।
आरोप-प्रत्यारोप के बीच सरकार आवास के मुद्दे पर काफी सक्रिय नजर आ रही है। केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने तीन लाख और मकानों को मंजूरी दी है। भाजपा अब हर हितग्राही तक पहुंचने की रणनीति बना रही है। पक्के आवास मिलने के बाद हितग्राहियों को धन्यवाद का पत्र भी दिया जाएगा। इसकी रूपरेखा तैयार की जा रही है।
छह महीने में सड़क की शिकायतें खत्म करने की कवायद
सरकार के कामकाज का आकलन चल रहा है। इसके साथ ही प्रशासनिक कसावट लाने की कवायद भी तेज हो गई है। आने वाले दिनों में भ्रष्टाचार और काम में लेट-लतीफी की शिकायतों पर तत्काल कार्रवाई की रणनीति बनाई गई है।
प्रदेश में सबसे ज्यादा शिकायतें सड़क निर्माण को लेकर सामने आ रही हैं। अंबिकापुर और बिलासपुर संभाग में सड़क के मुद्दे पर धरना-प्रदर्शन तक हो रहे हैं। पीडब्ल्यूडी सचिव मुकेश बंसल इस मामले पर पैनी नजर रखे हुए हैं। बारिश के बाद तेजी से निर्माण शुरू कराने के लिए रणनीति बनाई गई है और प्रस्तावों को मंजूरी दी गई है। बताया जाता है कि संगठन महामंत्री पवन साय ने भी इस सिलसिले में वित्त मंत्री ओपी चौधरी से चर्चा की है। अगले छह महीने के भीतर सड़क से जुड़ी शिकायतों को काफी हद तक खत्म करने की दिशा में काम चल रहा है।
रिटायर अफसरों की संविदा पर नजर
संस्कृति से जुड़े विभाग में हाल ही में तीन अफसर रिटायर हुए हैं। इन अफसरों के खिलाफ पूर्व में गंभीर शिकायतें रहने और जांच में घिरे होने की भी चर्चा रही है। अब खबर है कि ये सभी संविदा नियुक्ति के लिए प्रयास कर रहे हैं। कुछ लोगों का दावा है कि जल्द ही इन सभी को संविदा नियुक्ति मिल सकती है। हालांकि इस पर अंतिम फैसला होना बाकी है।
शराब का खेल कब थमेगा?
कांग्रेस सरकार के समय सामने आए करीब 3 हजार करोड़ रुपए के शराब घोटाले में कई अधिकारी-कर्मचारी और कथित षड्यंत्रकारी जेल तक पहुंच चुके हैं। कुछ को जमानत मिली है, लेकिन सत्ता बदलने के बाद भी शराब के खेल में बहुत ज्यादा बदलाव नजर नहीं आ रहा है। प्रदेश के 33 जिलों में अवैध शराब के कारोबार की शिकायतें आज भी लगातार सामने आ रही हैं। सरकारी शराब दुकानों में निर्धारित कीमत से अधिक दाम पर शराब बेचे जाने की शिकायतें भी आम हैं।
चर्चा है कि जिला स्तर पर शराब के इस खेल में वही पुराना सिस्टम अब भी चल रहा है। स्थानीय स्तर पर जिला प्रभारी, जिला आबकारी अधिकारी और सरकारी शराब दुकानों के सुपरवाइजर की भूमिका को लेकर सवाल उठते रहे हैं। सवाल यह भी है कि आखिर आबकारी विभाग और आयुक्त कार्यालय का जिलों पर कितना नियंत्रण है?
और तो और, आबकारी आयुक्त कार्यालय में एक ऐसे अधिकारी को एडिशनल कमिश्नर के पद पर बनाए रखने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, जिनका नाम कांग्रेस शासनकाल के कथित अवैध शराब कारोबार से जुड़े मामले में न्यायालय में पेश चालान में होने की चर्चा है। इसके बावजूद वे महत्वपूर्ण पद पर बने हुए हैं। यही नहीं, जिलों में पदस्थ अधिकारियों को संरक्षण दिए जाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं। आखिर इस मामले में सरकार की नीति क्या है, यह साफ होना बाकी है।
चर्चा है कि जिला स्तर पर यदि कोई छोटा आबकारी अधिकारी सरकारी शराब दुकान से निर्धारित मूल्य से अधिक कीमत पर शराब बेचने पर अंकुश लगाने की कोशिश करता है और प्रभावशाली लोगों के हित प्रभावित होते हैं, तो राज्य उड़नदस्ता भेजकर उसी अधिकारी पर कार्रवाई करवा दी जाती है। महासमुंद जिले में 7 सितंबर को हुई कार्रवाई को लेकर भी विभाग के भीतर ऐसी ही चर्चाएं हैं। सवाल यह है कि कार्रवाई अवैध शराब और ओवररेटिंग करने वालों पर होनी चाहिए या फिर उसे रोकने की कोशिश करने वाले अधिकारियों पर?

