CGwatch शबरी सेतु की बदहाली से आमजन त्रस्त, तीन साल से मरम्मत की आस अधूरी

नीरज शर्मा
शिवरीनारायण।
धार्मिक नगरी शिवरीनारायण की पहचान और जीवनदायिनी कही जाने वाली शबरी सेतु आज अपनी जर्जर और खस्ताहाल स्थिति पर आंसू बहा रही है। तीन वर्षों से लगातार उपेक्षा झेल रहा यह पुल अब आमजन के लिए आवागमन का साधन नहीं, बल्कि दुर्घटनाओं का केंद्र बन चुका है।
पुल की दुर्दशा से रोजाना गुजरने वाले लोग हर पल मौत के साए में सफर करने को मजबूर हैं। जगह-जगह पड़े गहरे गड्ढे, बाहर निकली हुई सरिया और उखड़ी हुई डामर की परतें इस बात का सबूत हैं कि पुल की सुध लेने वाला कोई नहीं।
हादसों का पुल बन चुका शबरी सेतु
शबरी सेतु की खराब हालत के कारण पिछले वर्षों में कई दर्दनाक हादसे हो चुके हैं। ताजा उदाहरण रक्षाबंधन के दिन का है, जब नगर के होनहार युवा वाशु यादव ने इस पुल की लापरवाही की भेंट चढ़कर असमय अपनी जान गंवा दी। पहले ही पिता को खो चुकी उसकी छोटी बहन और विधवा मां अब सहारे से वंचित हो गई हैं। यह घटना न केवल उस परिवार बल्कि पूरे नगर के लिए गहरा आघात लेकर आई।
केवल चुनावी मरम्मत, जनता से विश्वासघात
स्थानीय लोगों का आरोप है कि विधानसभा चुनाव 2024 जीतने के बाद नेताओं ने सिर्फ दिखावे के लिए पुल के एक हिस्से की मरम्मत करवाई थी। उस समय जनता को आश्वासन दिया गया कि शीघ्र ही पुल को पूरी तरह दुरुस्त किया जाएगा, लेकिन चुनाव बीतते ही यह वादा भी हवा हो गया। उसके बाद से पुल की ओर किसी भी जिम्मेदार जनप्रतिनिधि ने नज़र तक नहीं डाली।
बारिश ने बढ़ाई समस्या
आज हालत यह है कि बरसात के मौसम में पुल पर पानी का जमाव आम हो गया है। दो साल पूर्व जब मरम्मत का काम चल रहा था, तब बिना लेवलिंग और जल निकासी की उचित व्यवस्था किए ही कार्य को अधूरा छोड़ दिया गया। नतीजा यह हुआ कि बारिश के दिनों में पुल के दोनों किनारों और बीच में पानी भर जाता है, जिससे न केवल जाम और असुविधा होती है बल्कि पुल की मजबूती भी तेजी से कमजोर हो रही है।
“अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता”
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि सरकार और जनप्रतिनिधियों की उपेक्षा से यह कहावत चरितार्थ होती है – “अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता।” जनता का साफ कहना है कि यदि शीघ्र ही इस पुल की समुचित मरम्मत नहीं कराई गई, तो वे बड़े आंदोलन के लिए बाध्य होंगे।
जनता की चेतावनी
आमजन की पीड़ा अब आक्रोश में बदलती जा रही है। नागरिकों का कहना है कि जिस पुल पर रोज हजारों लोग गुजरते हैं, उसी की सुध लेने को कोई तैयार नहीं। दुर्घटनाओं और मौतों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। यदि समय रहते प्रशासन और सरकार ने ध्यान नहीं दिया, तो यह उपेक्षा और भी बड़े जनविरोध का रूप ले सकती है।
