भाजपा के एक मजबूत प्रत्याशी ने विधायकों को अपने तेवर दिखाए हैं। पार्टी के विधायक सोच रहे थे कि क्षेत्र में चुनाव खर्च उनके जरिए ही बंटेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ।
प्रत्याशी ने सीधे मंडल पदाधिकारियों को खर्च दे दिए।उस वक्त विधायक भी मौजूद थे।
निचले स्तर के कार्यकर्ता सीधे खर्च पाकर खुश हैं। लेकिन विधायकों को बुरा लग रहा है कि धन उन्हें खर्चने का मौका नहीं मिला। कुछ कार्यकर्ता इस बात से नाखुश हैं कि विधानसभा चुनाव की तुलना में कम राशि मिली है। अब लीड पर नजर है।
अब तक नाबाद..
आईएफएस अफसर अरूण प्रसाद ने रिकॉर्ड कायम किया है।वो अब तक के सबसे लंबे समय तक सीएसआईडीसी एमडी के पद पर रहे हैं। उनसे पहले रमन सरकार में वन अफसर सुनील मिश्रा के नाम था, लेकिन प्रसाद को करीब पांच साल हो चुके हैं।
हालांकि भूपेश सरकार ने कुछ समय के लिए सारांश मित्तर को एमडी बनाया था लेकिन अरूण प्रसाद फिर आ गए। प्रसाद अपने बेहतर प्रबंधन की वजह से दोनों ही सरकार के करीबी रहे हैं। भूपेश सरकार के करीबी अफसरों में अकेले हैं ,जो नाबाद हैं।
अपने भी दूर हो गए..
महासमुंद में पूर्व गृहमंत्री ताम्रध्वज साहू से कांग्रेस के नेता तो नाराज चल रहे हैं ही, समाज के कई प्रमुख लोग भी खुश नहीं हैं।
कांग्रेस प्रत्याशी साहू से शिकायत यह है कि प्रभारी मंत्री रहते कार्यकर्ताओं की सुध नहीं ली। और तो और उनके अपने करीबी एक नेता सामान्य काम के लिए गए, तो उनका काम करना दूर सीधे मुंह तक बात नहीं की। और अब जब पूर्व गृहमंत्री को प्रचार में मदद की जरूरत पड़ रही है, तो करीबी भी अब अपने घर से बाहर नहीं निकले हैं। ऐसे में पूर्व गृहमंत्री भी लड़ाई कठिन हो गई है।

राजनाथ सिंह का भाषण
केन्द्रीय रक्षामंत्री राजनाथ सिंह की गीदम की सभा भीड़ के लिहाज से काफी सफल रही है। उनके भाषण पर पार्टी के लोगों ने खुशी जताई है।
विधानसभा चुनाव के पहले कांकेर में राजनाथ सिंह का भाषण इतना बोरिंग था कि पार्टी के लोगों ने उनकी अपने यहां सभा नहीं कराने की सलाह दे दी थी।
राजनाथ ने अपने भाषण की शुरुआत कांकेर में मोदी सरकार की विदेश नीति से शुरू की थी और अमेरिका, खाड़ी के देशों से होते हुए पाकिस्तान तक पहुंचे तब तक आधे से ज्यादा भीड़ जा चुकी थी। केन्द्र सरकार की उपलब्धियों को सुनने के लिए गिनती के लोग बचे थे। मगर इस बार राजनाथ सिंह ने आदिवासी मुद्दों पर बात की। मोदी सरकार के कामों का ब्यौरा दिया। कुल मिलाकर सब कुछ ठीक ठाक रहा।
सत्ता जाते ही दुआ-सलाम भी बंद
सत्ता जाने की पीड़ा क्या होती है यह जानना हो तो किसी कांग्रेसी से मिल लें। चार माह में ऐसी हालत हो गई कि जैसे अपने ही पराए हो गए । पन्द्रह साल संघर्ष के बाद तो सत्ता मिली थी, पांच साल भी ठीक से भोग नहीं पाए थे और फिर छिन गई। जब तक सत्ता में थे नमस्कार -चमत्कार करने वाले एकदम से बढ़ गए थे । लोग आगे पीछे घूमते रहते थे। अब मंत्री पद पर रहे लोगों को भी कोई पूछ नहीं रहा। ज्यादातर लोग अब तक हार के सदमे से उबर नहीं पाए हैं। हालत यह है कि अपने ही गरिया रहे हैं। कई से तो पार्टी में रहना ही बर्दाश्त नहीं हो रहा। सत्ता में रहने के दौरान ठीक से भाव नहीं मिलने की भड़ास अब वे निकालना चाह रहे। दूसरी पार्टी में जाकर ऐसे ऐसे आरोप लगा रहे कि जवाब देते भी नहीं बन रहा। दिलचस्प यह है कि पहले जिनको भला-बुरा कहते थे अब उन्हीं के साथ बैठना पड़ रहा। लेकिन ज्यादातर लोगों का यह कहना है कि दूसरी पार्टी में जाने वालों को भी भाव सिर्फ चुनाव तक ही मिलने वाला है, उसके बाद उन्हें वहां भी कोई पूछने वाला नहीं होगा। ऐसे लोग तब घर के रहे न घाट के….. जैसी स्थिति में आ जाएंगे।

