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सुशीला के जीवन में हुआ संघर्षों का सुखद अंत, मनरेगा में मेट का काम मिलने से आसान हुई जिन्दगी

  • अपनी आर्थिक जरूरतें पूरी कर परिवार का भी कर रही है भरण-पोषण
  • मनरेगा के कार्यों मे महिलाओं को नियोजित करने के लिए प्रेरित कर रही हैं सुशीला

आफ़ताब आलम/बलरामपुर : मैं गोदी नाप लेती हूं, श्रमिकों से बात कर उन्हें काम मांगने हेतु प्रेरित करना, उन्हें काम में नियोजित करने के साथ ही मेट पंजी संधारण का काम भी आसानी से कर लेती हूं, यह कहना है 28 वर्षीय सुशीला का जो अब मनरेगा में मेट का कार्य कर बेहतर ज़िंदगी जी रही हैं। आत्मविश्वास से भरे सुशीला के इन शब्दों ने बहुत महिलाओं को प्रेरित किया है और इसका सकारात्मक असर है कि मनरेगा के कार्यों में महिला श्रमिकों का रुझान बढ़ा है तथा वे आगे आकर रोजगार प्राप्त कर रही हैं। दरअसल विकासखण्ड वाड्रफनगर के ग्राम पंचायत परसडीहा की रोजगार सहायक जसमनी टोप्पो ने मेट चयन के दौरान सुशीला के व्यवहार, कार्यकुशलता व सक्रियता को देखकर उसे मेट की जिम्मेदारी दी। सुशीला इस जिम्मेदारी का बखूबी निर्वहन कर रही है तथा मेट के रूप में उसके काम की सभी सराहना करते हैं। सुशीला बताती हैं कि जब पहली बार उन्हें ग्राम पंचायत द्वारा मेट का कार्य करने के लिए पूछा गया तो उन्हें लगा कि वह इतना बड़ा कार्य कैसे करेगी। किन्तु अधिकारियों के सहयोग और सुशीला की इच्छा शक्ति से आज वह मेट के सारे दायित्वों का बेहतर ढंग से निर्वहन कर रही है। प्रतिदिन गोदी नापने से लेकर श्रमिकों से बात कर उन्हें काम मांगने हेतु प्रेरित करना, श्रमिकों को कार्य में नियोजित करना तथा पंजी संधारण का कार्य बड़ी आसानी से कर लेती हैं। सुशीला बतौर मेट एक और उल्लेखनीय कार्य कर रही हैं जिसमें वे महिला श्रमिकों को मनरेगा के कार्यों में नियोजित करने हेतु प्रयासरत हैं तथा जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आये हैं। सुशीला बताती हैं कि उनके तीन बच्चे हैं और वह पिछले कुछ वर्षों से एक आंख में परेशानी होने के कारण आर्थिक परेशानियों का सामना कर रही थी, किंतु अब उनकी आर्थिक दिक्कतें दूर हुई है। मेट का काम मिलने से वह अपनी जरूरतें पूरी कर पा रही हैं और अपने परिवार भरण-पोषण कर सुंदर जीवन व्यतीत कर रही हैं। सुशीला के संघर्षों का एक सुखद अंत हुआ है और अपने मनोबल से अपनी जिन्दगी संवारने के प्रयास में वह सफल हो रही है।

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