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छत्तीसगढ़ HC ने कहा- पति-पत्नी के बीच विवाद है या नहीं, यह देखना कोर्ट का काम नहीं; डर, दबाव या प्रलोभन नहीं होना चाहिए, सहमति है तो ले सकते हैं तलाक

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बिलासपुर : हाईकोर्ट ने कहा कि अगर पति-पत्नी के बीच आपसी सहमति है, तो वे तलाक ले सकते हैं। कोर्ट को तलाक का आदेश पारित करना होगा। कोर्ट का काम यह देखना नहीं है कि पति-पत्नी के बीच विवाद है या नहीं। तलाक के लिए डर, दबाव या प्रलोभन नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि आपसी सहमति के आधार पर वैवाहिक पृथक्करण (एक साल अलग रहने) का आदेश नहीं दिया जा सकता है। संध्या सेन की ओर से हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। इसमें कहा गया कि उनका विवाह संजय सेन के साथ 20 फरवरी 2017 को हुआ था। शादी के बाद संध्या सेन सिर्फ 2 दिन अपने ससुराल में रहीं थी। फिर आपसी मनमुटाव के चलते वह मायके चली गईं। इसके बाद आपसी सहमति और हिंदू विवाह अधिनियम के तहत तलाक के लिए आवेदन प्रस्तुत किया, पर परिवार कोर्ट ने वैवाहिक पृथक्करण का आदेश जारी कर दिया।

परिवार कोर्ट ने कहा- दो दिन में कोई मनमुटाव नहीं हो सकता
परिवार न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत होने के बाद दोनों ने बयान भी दिया कि वे आपसी सहमति से तलाक ले रहे हैं। दोनों के बीच दहेज या दूसरा कोई विवाद नहीं है और दोनों एक साल से अलग हैं। इसके बाद भी परिवार कोर्ट कहा कि दो दिन में कोई मनमुटाव नहीं हो सकता। इसके बाद तलाक मंजूर करने की जगह एक साल तक के लिए वैवाहिक पृथक्करण का आदेश पारित कर दिया। इसी आदेश को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी।

हाईकोर्ट ने कहा- तकनीकी आधार पर दिया गया फैसला गलत
वहीं हाईकोर्ट ने माना कि धारा 13 (बी) में कोर्ट को यह देखना है कि तलाक के लिए कोई डर, दबाव या प्रलोभन तो नहीं है। फिर भी एकदम से तकनीकी पहलू पर जाकर निचली अदालत ने फैसला दिया जो गलत है। कोर्ट को यह देखना है कि सहमति है या नहीं और तलाक का आदेश पारित करना है। हाईकोर्ट ने मामले तलाक का आदेश दिया। मामले की सुनवाई जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनके चंद्रवंशी की युगल पीठ में हुई।

क्या है हिंदू विवाह अधिनियम 1955 की धारा 13(बी)
हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत 13(बी) के तहत पति-पत्नी आपसी सहमति से तलाक ले सकते हैं। अधिनियम में कहा गया है कि आपसी सहमति से तलाक लेने के लिए भी आवेदन शादी के एक साल बाद ही कर सकते हैं। इस दौरान दंपति को अलग-अलग रहना होता है। हालांकि स्पेशल केस में अगर प्रार्थी बहुत ज्यादा कष्ट में हो तो कोर्ट समय सीमा में रियायत दे सकता है।

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