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समृद्धि देशी बीज बैंक विलुप्त हो रही देशी लौकी की 20 किस्म को कर रही संरक्षित

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नवागढ़/बेमेतरा संजय महिलांग

सब्जियों की प्रजाति को बचाने के लिए नगर पंचायत नवागढ़ के युवा किसान ने देशी बीज बैंक की नींव रखी है। बीज बैंक से किसान जिस मात्रा में बीज लेते हैं, फसल होने पर उसकी डेढ़ गुना वापस करते हैं।

। दरअसल, खेती में आधुनिक तकनीक और अधिक उत्पादन बढ़ाने की होड़ में पिछले कई वर्षों में देसी किस्म के सब्जियों की वेरायटियां विलुप्ति के कगार पर हैं।

नगर पंचायत नवागढ़ पर स्थित देशी बीज बैंक सुरभि सेवा संस्थान द्वारा संचालित किया जाता है जिसमें 8 सदस्यीय दल इसकी देखरेख करते हैं। हाल में 20 अधिक वेरायटी के देशी लौकी बीज मौजूद हैं।

गौ वंश आधारित देसी खाद और कीटनाशक भी उपलब्ध

स्थानीय किसानों को फायदा पहुंचाने के लिए यहां से बीज का आदान प्रदान होता है और देशी बीज के लिए लगने वाले देशी नुस्खों से तैयार गौ वंश आधारित खाद और कीटनाशक का भी प्रयोग करना सिखाया जाता है ताकि किसान को लागत में कमी के साथ नुकसान की आशंका भी कम हो। गौमूत्र,आदि से कीटनाशक तैयार किए जाते हैं वहीं नीम, धतूरा, फुड़हर, से खाद का निर्माण किया जाता है।

गौ वंश आधारित जैविक खेती की ओर बढ़ रहे किसान

युवा किसान किशोर राजपूत और देवी वर्मा का मानना है कि वर्तमान में किसान और लोगों का रुझान एक बार फिर गौ वंश आधारित प्राकृतिक आहार की ओर है। ऐसे में पुराने किस्म की विलुप्तता को बचाने एक बार फिर प्रयास शुरु करने की आवश्यकता हैं इसलिए उन्होनें गौ वंश आधारित जैविक खेती और देशी पुराने किस्म के बीजों को बचाने इस बैंक की स्थापना की।

देशी बीज बैंक में महिलाएं भी सदस्य हैं

नवागढ़ विधान सभा क्षेत्र के दर्जनों गांवों के 25 से अधिक किसान इस बैंक में सदस्य हैं। खास बात यह भी है कि इसमें महिला किसान भी सक्रिय सदस्य हैं। सरिता वर्मा बताती है कि किसान जरुरत के मुताबिक उत्पादन के लिए बीज ले जाते है और वापसी के दौरान ली हुई मात्रा का ड़ेढ़ गुना लौटाना होता है।

नगर पंचायत नवागढ़ का पहला बीज बैंक

देशी धान और सब्जियों की पुरानी किस्मों को बचाने की शुरुआत नगर पंचायत नवागढ़ से हुई। 5 दिनों तक 5 गांव मे देशी बीज बचाओ अभियान के तहत देसी अनाजों, वनस्पतियों, पेड़–पौधों, देशज पशुओं, मवेशियों और विलुप्त हो रही जैव विविधता पर गाँव की चौपाल पर ग्रामीणों से चर्चा की गई थी।

खेती का देशी तरीका हरित क्रांति ने बदला

सुरभि सेवा संस्थान के द्वारा संचालित समृद्धि देशी बीज बैंक से जुड़ीं लक्ष्मी राजपूत का कहना है कि इन्हें बचाना इसलिये भी आवश्यक है कि ये प्रजातियाँ हजारों सालों और कई पीढ़ियों से रची बसी हुई थीं।

यही कारण है कि ज्यादा या कम बारिश के बाद भी फसल रोग का इन पर उतना ज्यादा असर नहीं होता है, जितना फिलहाल की जा रही खेती में होता है। हरित क्रान्ति के बाद परम्परागत खेती का तरीका बदला और पुरानी किस्में भुलाकर आयातित प्रजातियों की खेत को ही आधार मान लिया गया।

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