भरत मिश्रा/चिरमिरी/कोरिया। अपनी लेखनी से हिन्दी साहित्य को समृद्ध करने वाले कथाकार, निबंधकार, व्यंग्यकार नरेंद्र कोहली के निधन से साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति हुई है। 81 वर्षीय लेखक नरेंद्र कोहली का निधन कोरोना से 17 अप्रैल को हुआ है। उन्होंने अपनी लेखनी से शताधिक श्रेष्ठ ग्रंथों का सृजन किया है। राम और कृष्ण कथा को आधार बनाकर लिखे गए उपन्यासों की श्रृंखला पाठकों के बीच बहुत लोकप्रिय रही है। हिन्दी साहित्य में महाकाव्यात्मक उपन्यास की विधा को प्रारंभ करने का श्रेय नरेंद्र कोहली को ही जाता है। पौराणिक एवं ऐतिहासिक चरित्रों के माध्यम से उन्होंने आधुनिक युग की समस्याओं को समझने और सुलझाने के महत्वपूर्ण सूत्र अपनी रचनाओं में दिए हैं। वास्तव मे कोहली जी सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रवादी चेतना के प्रखर और मुखर आवाज थे, जिन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय जीवन दर्शन का सम्यक परिचय कराया है।
उक्त बातें हिन्दी के प्रख्यात लेखक नरेन्द्र कोहली के निधन पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए शासकीय लाहिड़ी स्नातकोत्तर महाविद्यालय चिरमिरी के हिन्दी विभागाध्यक्ष और युवा आलोचक डॉ. राम किंकर पाण्डेय ने कहीं हैं। दिवंगत साहित्यकार को श्रद्धांजलि देते हुए डॉ. पाण्डेय ने कहा कि आधुनिक युग में नरेंद्र कोहली ने साहित्य में आस्थावादी मूल्यों को स्वर दिया है, 1975 ई. में उनका पहला उपन्यास दीक्षा प्रकाशित हुआ, जो काफी लोकप्रिय हुआ था। उन्होंने अपनी कथा के माध्यम से भारतीय मनीषा के नायक मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के चरित्र को आधुनिक परिस्थितियों के अनुसार प्रस्तुत किया। युगों युगों के अन्धकार को चीरकर उन्होंने भगवान राम की कथा को भक्तिकालीन भावुकता से निकालकर आधुनिक यथार्थ की जमीन पर खड़ा कर दिया। महासममर की पूरी श्रृंखला ने एक नया पाठक वर्ग तैयार किया था। उपन्यास के साथ साथ उन्होंने गद्य साहित्य की अन्य विधाओं पर भी विपुल मात्रा में लेखन किया है। उनकी रचनाएँ आनेवाले समय में समाज को एक नया रास्ता दिखाने का कार्य करती रहेंगी। आज उनके निधन से पूरा साहित्य जगत शोकमग्न है।
नरेंद्र कोहली के निधन से साहित्य जगत की अपूरणीय क्षति हुई है : डॉ. राम किंकर पाण्डेय

