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गारंटी का ‘चमत्कार’ या सेहत का ‘व्यापार’? बालोद में फर्जीवाड़े के खेल पर प्रेस रिपोर्टर क्लब का बड़ा प्रहार!

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The ‘miracle’ of guarantee or the ‘business’ of health? A big blow to the Press Reporters’ Club on the game of fraud in Balod!

जिला संयोजक फिलिप चाको और जिलाध्यक्ष तरुण योगी के नेतृत्व में प्रेस रिपोर्टर क्लब बालोद की पूरी टीम ने खोला मोर्चा; कोतवाली में ज्ञापन सौंपकर उठाई निष्पक्ष जांच की मांग

बालोद। अगर आप किसी बीमारी से परेशान हैं और बालोद की सड़कों पर चलते हुए आपको बोर्ड दिखे—“100% शर्तिया इलाज की गारंटी!”—तो खुश होने से पहले ज़रा ठहरिए! क्योंकि यहाँ चिकित्सा विज्ञान के तमाम सिद्धांत पीछे छूट चुके हैं और जड़ी-बूटी से लेकर चमत्कारी डिग्रीधारियों का ‘गारंटी वाला खेल’ धड़ल्ले से जारी है। अब सवाल यह है कि मरीज अस्पताल इलाज कराने जा रहा है या अपनी सेहत और जेब दोनों का सौदा करने?

स्वास्थ्य व्यवस्था में जारी इसी ‘जादुई मायाजाल’ और कथित अनियमितताओं की हवा निकालने के लिए प्रेस रिपोर्टर क्लब बालोद की पूरी टीम सड़क से लेकर प्रशासनिक गलियारे तक उतर आई है। क्लब के जिला संयोजक फिलिप चाको एवं जिलाध्यक्ष तरुण योगी के नेतृत्व में समस्त प्रेस रिपोर्टर क्लब बालोद की टीम ने सिटी कोतवाली पहुंचकर एक कड़ा शिकायती आवेदन सौंपा है। इस संयुक्त पहल में टीम ने जिले के कथित अपंजीकृत क्लिनिकों, झोलाछाप डॉक्टरों, फर्जी लैब, नियम-विरुद्ध चल रहे मेडिकल स्टोरों और सोनोग्राफी सेंटरों की पोल खोलते हुए कड़ी जांच की मांग की है।

1. बीमारी गंभीर, पर इलाज ‘गारंटीड’! यह कौन-सी जादुई विद्या है?

आवेदन में प्रेस रिपोर्टर क्लब की टीम ने तीखा सवाल उठाया है कि जब दुनिया के बड़े-बड़े विशेषज्ञ डॉक्टर भी किसी मरीज को 100 प्रतिशत ठीक करने की गारंटी नहीं देते, तो बालोद में ऐसी कौन-सी ‘अदृश्य शक्ति’ या जादुई विद्या बांटी जा रही है, जिससे गंभीर से गंभीर बीमारियों के शर्तिया इलाज का दावा बोर्ड पर टांग दिया जाता है?

जिला संयोजक फिलिप चाको और जिलाध्यक्ष तरुण योगी ने मांग की है कि ऐसे दावों की आड़ में दुकान चला रहे कथित आयुर्वेद व होम्योपैथी ‘विशेषज्ञों’ की शैक्षणिक योग्यता, डिग्री, पंजीयन और कानूनी अधिकारों की त्वरित जांच की जाए।

2. जगमगाता बोर्ड, पर पंजीयन का हिसाब गोल!

जिले में कई निजी अस्पताल, नर्सिंग होम और क्लिनिक ऐसे संचालित हो रहे हैं जिनके बोर्ड तो इतने चमकदार हैं कि दूर से आंखें चौंधिया जाएं, लेकिन जब बात कागजी वैधता और पंजीयन की आती है, तो सन्नाटा पसर जाता है। प्रेस रिपोर्टर क्लब बालोद की टीम ने सवाल दागा है—यदि बिना अनुमति और बिना वैध डिग्री के ‘दुकानें’ सज रही हैं, तो स्वास्थ्य विभाग का उड़नदस्ता किस कुंभकर्णी नींद में सो रहा है?

3. मेडिकल स्टोर या ‘ऑल-इन-वन’ मिनी अस्पताल?

दुकान का बोर्ड कहता है ‘मेडिकल स्टोर’, लेकिन अंदर का नजारा किसी मिनी क्लिनिक से कम नहीं! शिकायत में बताया गया है कि कई जगहों पर पंजीकृत फार्मासिस्ट तो गायब रहते हैं, लेकिन काउंटर पर बैठे महाशय खुद ही डॉक्टर बनकर मरीज का नाड़ी परीक्षण, निदान और मनमानी दवाइयों की पर्ची फाड़ रहे हैं। दवा बेचने की जगह खुद इलाज करने का यह ‘हुनर’ आखिर किस कानून के तहत जायज है?

4. सैंपल कलेक्शन सेंटर के नाम पर पूरी पैथोलॉजी लैब का खेल

जांच रिपोर्ट के आधार पर डॉक्टर दवा लिखता है, लेकिन अगर रिपोर्ट ही फर्जी या अंदाज़े पर बने तो? आरोप है कि कई जगह सिर्फ ‘सैंपल कलेक्शन सेंटर’ की अनुमति लेकर पूरी की पूरी पैथोलॉजी लैब चला दी जा रही है। प्रेस रिपोर्टर क्लब बालोद ने स्पष्ट मांग की है कि जांच रिपोर्ट जारी करने वाले कर्मचारियों की योग्यता और लैब के टेक्नीशियन की वैधता की जांच होनी ही चाहिए।

5. सोनोग्राफी सेंटर, PCPNDT नियम और नशीली दवाओं का काला कारोबार

शिकायत पत्र में सोनोग्राफी सेंटरों में PCPNDT एक्ट (गर्भलिंग परीक्षण निषेध कानून) के कड़ाई से पालन और मशीनों की वैधता की जांच की मांग की गई है। इसके साथ ही, मेडिकल स्टोरों की आड़ में बिना पर्चे के बिक रही प्रतिबंधित व नशीली गोलियों के काले कारोबार पर भी प्रेस रिपोर्टर क्लब की पूरी टीम ने गंभीर चिंता जताई है। स्टॉक रजिस्टर, लाइसेंस और बिक्री पर्चियों की जांच से कई ‘सफेदपोश’ बेनकाब हो सकते हैं।

6. ग्रामीण इलाकों में अवैध गर्भपात का खौफनाक जाल

ग्रामीण अंचलों में अप्रशिक्षित और झोलाछाप लोगों द्वारा अवैध रूप से कराए जा रहे गर्भपात की शिकायतों पर भी क्लब ने प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया है। यह मुद्दा सीधे तौर पर महिलाओं की जिंदगी और मौत से जुड़ा है, जिस पर तुरंत पुलिस व प्रशासनिक कार्रवाई की आवश्यकता है।

अब गेंद प्रशासन के पाले में: कार्रवाई होगी या फाइलें धूल खाएंगी?

प्रेस रिपोर्टर क्लब बालोद के जिला संयोजक फिलिप चाको, जिलाध्यक्ष तरुण योगी एवं समस्त पत्रकार साथी ने स्पष्ट कर दिया है कि यह मुद्दा किसी एक मरीज का नहीं, बल्कि पूरे जिले की जन-स्वास्थ्य सुरक्षा से जुड़ा है।

व्यंग्य और तंज अपनी जगह हैं, लेकिन सवाल बेहद गंभीर है—अगर सब कुछ कानून और नियमों के दायरे में चल रहा है, तो निष्पक्ष जांच से डर कैसा? और यदि परदे के पीछे फर्जीवाड़े का खेल चालू है, तो फिर बुलडोज़र और कार्रवाई की चाबुक कब चलेगी?

अब देखना यह होगा कि बालोद का पुलिस प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और औषधि प्रशासन इस शिकायती पत्र पर कागजी खानापूर्ति करता है या सच में ‘गारंटी वाले फर्जीवाड़े’ पर नकेल कसता है!

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