Chai Pe Charcha: Became a minister through the public’s vote… then why was the public left standing outside the door?
चाय की चुस्की के साथ आज चर्चा उस तस्वीर की, जो लोकतंत्र के लिए असहज सवाल खड़े करती है।
जनता किसी नेता को अपना प्रतिनिधि बनाती है। पार्टी उसे टिकट देती है, जनता वोट देती है, विधायक बनाती है और सरकार उसे मंत्री की जिम्मेदारी सौंपती है। यानी सत्ता की पूरी सीढ़ी का पहला पायदान जनता ही है।
लेकिन सवाल तब उठता है, जब वही जनता अपने मंत्री से मिलने पहुंचे और उसे मंत्री के कमरे के बाहर खड़े होकर इंतजार करना पड़े।
हाल ही में कवर्धा सर्किट हाउस में शिक्षा मंत्री के पहुंचने के दौरान ऐसा ही माहौल दिखाई देने की बात सामने आई। बड़ी संख्या में लोग मंत्री से मिलने पहुंचे थे। कुछ लोग अपनी समस्या बताना चाहते थे, कुछ शुभकामनाएं देना चाहते थे और कुछ अपने क्षेत्र की बात रखना चाहते थे।
लेकिन वहां मौजूद सुरक्षा व्यवस्था के कारण आम लोगों को अंदर जाने की अनुमति नहीं मिली। लोगों से कहा गया कि मंत्री जी जब बाहर निकलेंगे, तब मुलाकात होगी।
अब सवाल यह है कि क्या जनता से मिलने के लिए मंत्री तक पहुंचने के बीच इतनी लंबी दीवार खड़ी होनी चाहिए
बारिश के बीच लोग बाहर इंतजार करते रहे। दूसरी ओर अधिकारी और प्रभावशाली लोगों की मंत्री से मुलाकात होती रही—ऐसा वहां मौजूद लोगों का कहना है। इंतजार करते-करते कुछ लोग बिना मुलाकात के वापस लौट गए।
यहां मुद्दा किसी व्यक्ति विशेष का अपमान करना नहीं, बल्कि जनप्रतिनिधि और आम जनता के बीच बढ़ती दूरी पर सवाल उठाना है।
सुरक्षा व्यवस्था अपनी जगह जरूरी है। मंत्री की व्यस्तता भी अपनी जगह है। लेकिन क्या ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकती कि आम आदमी के लिए भी मिलने का कोई व्यवस्थित समय और रास्ता तय हो
क्योंकि चुनाव के समय यही आम आदमी बूथ तक जाता है। धूप में लाइन लगाता है। बारिश में भी मतदान करता है। अपने प्रतिनिधि को चुनता है।
फिर चुनाव जीतने के बाद अगर उसी आम आदमी को मंत्री से मिलने के लिए दरवाजे के बाहर इंतजार करना पड़े, तो सवाल उठना स्वाभाविक है
मंत्री जनता के लिए हैं या जनता को मंत्री तक पहुंचने के लिए किसी ‘अप्रोच’ की जरूरत है?
लोकतंत्र में मंत्री का कद बड़ा हो सकता है, पद बड़ा हो सकता है, सुरक्षा बड़ी हो सकती है लेकिन जनता से बड़ा कोई पद नहीं होता।
और चाय की आखिरी चुस्की पर बस इतना ही सवाल
जिस जनता ने विधायक बनाया, उसी जनता से मिलने के लिए जनता को बाहर क्यों खड़ा रहना पड़ा
पत्रकार: दीपक तिवारी

