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CG NEWS: सोमवार से शनिवार तक अलग-अलग प्रभारी प्राचार्य, DEO ने फटकार लगाकर रद्द किया आदेश

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CG NEWS: Various acting principals and the DEO reprimanded staff and revoked the order—effective Monday through Saturday.

खैरागढ़। छत्तीसगढ़ के खैरागढ़ का शिक्षा विभाग एक बार फिर ऐसा कारनामा लेकर सामने आया है, जिसे जानकर सवाल उठना लाजिमी है। स्कूल में प्राचार्य एक, लेकिन ‘प्रभारी प्राचार्य’ छह! जी हां, जिला मुख्यालय के स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट हिंदी/अंग्रेजी माध्यम-2 शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में प्राचार्य की कुर्सी का बाकायदा साप्ताहिक बंटवारा कर दिया गया। सोमवार की कुर्सी अलग, मंगलवार की अलग और शनिवार तक अलग-अलग शिक्षक! हालांकि शिक्षा विभाग को यह ‘नई व्यवस्था’ रास नहीं आई और डीईओ ने आदेश सामने आते ही इसे निरस्त कर दिया। भौगोलिकसंदर्भ

 

पढ़िए पूरी खबर

मामला 24 जुलाई 2026 के आदेश क्रमांक 976 से जुड़ा है। विद्यालय के प्राचार्य कमलेश्वर सिंह ने अंग्रेजी माध्यम स्कूल के सुव्यवस्थित संचालन के नाम पर हिंदी माध्यम के छह व्याख्याताओं को सप्ताह के छह अलग-अलग दिनों के लिए प्रभारी प्राचार्य नियुक्त कर दिया।

 

आदेश के मुताबिक, सोमवार को कुणाल टंडन, मंगलवार को गिरवर कोसरे, बुधवार को विनिता सिंह, गुरुवार को उपमा देवी त्रिपाठी, शुक्रवार को गुंजन सिंह और शनिवार को अखिलेश श्रीवास्तव प्रभारी प्राचार्य की जिम्मेदारी संभालते। यानी छुट्टी के दिन को छोड़ दें तो प्राचार्य की कुर्सी का पूरा साप्ताहिक रोस्टर तैयार था।

 

इन प्रभारी प्राचार्यों को सिर्फ नाम भर की जिम्मेदारी नहीं दी गई थी। आदेश में उन्हें संविदा शिक्षकों की समय पर उपस्थिति सुनिश्चित करने, हर कालखंड में अध्यापन कराने और विद्यार्थियों में अनुशासन बनाए रखने जैसे काम भी सौंपे गए थे। मतलब स्कूल खुलते ही यह तय रहता कि आज प्राचार्य की कुर्सी किसके हिस्से में आई है। अब इसे विभागीय व्यवस्था कहें या कुर्सी का ‘डे-वाइज बंटवारा’, लेकिन मामला सामने आते ही शिक्षा विभाग में इसकी खूब चर्चा शुरू हो गई।

 

डीईओ बोले- प्राचार्य मौजूद हैं तो छह-छह प्राचार्य क्यों?

मामला जिला शिक्षा अधिकारी मुकुल साव तक पहुंचा तो उन्होंने प्राचार्य को फोन कर इस तरह का आदेश जारी करने पर फटकार लगाई। डीईओ ने साफ किया कि जब विद्यालय में नियमित प्राचार्य पदस्थ हैं, तब किसी दूसरे शिक्षक को प्रभारी प्राचार्य के रूप में कार्यरत नहीं किया जा सकता। इसके बाद आदेश को तत्काल निरस्त कर दिया गया। यानी जिस आदेश में सोमवार से शनिवार तक प्राचार्य की जिम्मेदारी बांट दी गई थी, वह विभागीय आपत्ति के बाद ज्यादा दिन टिक ही नहीं पाया।

 

कलेक्टर से लेकर डीईओ तक भेजी कॉपी, फिर भी नहीं चला ‘प्रयोग’

इस पूरे मामले में दिलचस्प बात यह भी है कि आदेश की प्रतिलिपि कलेक्टर, जिला शिक्षा अधिकारी और विकासखंड शिक्षा अधिकारी तक भेजी गई थी। यानी व्यवस्था इतनी बाकायदा थी कि अधिकारियों को भी इसकी जानकारी दी गई थी, लेकिन शायद किसी ने यह नहीं सोचा कि प्राचार्य की कुर्सी का साप्ताहिक रोस्टर आखिर किस नियम-कायदे की किताब में दर्ज है। मामले में शाला विकास समिति के अध्यक्ष आलोक श्रीवास ने भी कहा कि उन्हें इस आदेश की जानकारी नहीं थी और प्राचार्य ने उनसे इस संबंध में कोई चर्चा नहीं की।

 

फिलहाल डीईओ के निर्देश के बाद छह दिनों में छह प्रभारी प्राचार्य बनाने वाली व्यवस्था खत्म हो गई है। मगर शिक्षा विभाग के सामने सवाल अब भी खड़ा है, जब स्कूल में प्राचार्य मौजूद हैं, तो प्राचार्य की कुर्सी का साप्ताहिक बंटवारा करने की जरूरत आखिर क्यों पड़ी? और उससे भी बड़ा सवाल, क्या शिक्षा विभाग में नियमों से पहले नए-नए प्रयोगों की बारी आती है?

 

 

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