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कानूनी दांव पड़ा उल्टा! ACB-EOW अफसरों के खिलाफ दायर परिवाद खारिज, अब रिवीजन की तैयारी

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रायपुर। एंटी करप्शन ब्यूरो/इकोनॉमिक ऑफेंस विंग (ACB-EOW) के चीफ समेत तीन अफसरों के खिलाफ दायर परिवाद को अदालत ने खारिज कर दिया है। रायपुर की प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने साफ कहा कि यह मामला उनके अधिकार क्षेत्र (ज्यूरिडिक्शन) में नहीं आता, इसलिए परिवाद पर विचार नहीं किया जा सकता।

न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी आकांक्षा बेक ने आदेश जारी करते हुए कहा कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 183 के तहत दर्ज बयानों से जुड़े मामलों की सुनवाई उसी न्यायालय में संभव है, जहां वे साक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किए गए हों। चूंकि वर्तमान मामले में अदालत को विचारण की अधिकारिता प्राप्त नहीं थी, इसलिए परिवाद निरस्त कर दिया गया।

किन अधिकारियों पर लगे थे आरोप?

परिवाद में ACB/EOW चीफ अमरेश मिश्रा, एडिशनल एसपी चंद्रेश ठाकुर और डीएसपी राहुल शर्मा पर आरोप लगाया गया था कि उन्होंने धारा 164 के तहत कथन दर्ज कराने में कूट रचना (फर्जीवाड़ा) की। परिवादी पक्ष ने इसे आपराधिक कृत्य बताते हुए अदालत से कार्रवाई की मांग की थी।

अदालत में हुई तीखी बहस

मामले की स्वीकार्यता को लेकर राज्य सरकार और परिवादी पक्ष के बीच जोरदार बहस हुई। बचाव पक्ष (राज्य सरकार) की ओर से अधिवक्ता रवि शर्मा ने तर्क दिया कि संबंधित अधिकारी अपने शासकीय कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे थे और उन्हें वैधानिक संरक्षण प्राप्त है। साथ ही यह मामला संबंधित न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर है।परिवादी पक्ष के अधिवक्ता फैजल रिजवी ने दलील दी कि अपराध की सूचना देना नागरिक का संवैधानिक अधिकार है और अदालत को आरोपों पर विचार करना चाहिए।

 

आगे क्या?

अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि परिवाद प्रचलनशील नहीं है, इसलिए प्रारंभिक साक्ष्य और धारा 94 BNSS से जुड़े आवेदनों पर भी विचार संभव नहीं है। फैसले के बाद परिवादी पक्ष ने संकेत दिया है कि वे इस आदेश के खिलाफ रिवीजन याचिका दायर करेंगे। उन्होंने कहा कि कानूनी लड़ाई जारी रहेगी। फिलहाल, कोर्ट के इस आदेश से तीनों अधिकारियों को राहत मिली है।

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